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International Women’s Day : मुश्किल हालात भी नहीं रोक पाए बेटियों के कदम, संघर्ष से लिखीं सफलता की कहानियां
मुरादाबाद : जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियां कई बार इंसान की हिम्मत और धैर्य की परीक्षा लेती हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो चुनौतियों से हार मानने के बजाय उनसे लड़कर अपनी अलग पहचान बना लेते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दो ऐसी महिलाओं की कहानी सामने आई है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया।
हादसे के बाद भी नहीं हारीं आशा तोमर
मूल रूप से दिल्ली के शाहदरा में जन्मी आशा तोमर की शादी के बाद उनका जीवन पिलखुआ में सामान्य रूप से चल रहा था। 31 मार्च 2022 को हुए एक ट्रेन हादसे में उन्होंने अपने दोनों पैर गंवा दिए। इस हादसे के बाद उन्हें करीब आठ महीने तक दिल्ली के अस्पताल में इलाज कराना पड़ा।
इलाज के बाद जब वे पिलखुआ स्थित ससुराल लौटीं तो परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं। ऐसे कठिन समय में उनकी बहन कंचन चौहान ने उनका सहारा बनकर उन्हें मुरादाबाद ले आईं और नया जीवन शुरू करने का हौसला दिया।
आशा ने शुरुआत में एक छोटी टिफिन सर्विस शुरू की। धीरे-धीरे मेहनत और लगन से उन्हें छोटे आयोजनों में भोजन व्यवस्था के ऑर्डर मिलने लगे और समय के साथ उन्होंने अपना छोटा कैटरिंग व्यवसाय खड़ा कर लिया। आज आशा तोमर एक उद्यमी होने के साथ-साथ बहन के स्कूल में कक्षा तीन के बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रही हैं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है।
संघर्ष के दम पर आशी यादव ने बनाई पहचान
मुरादाबाद के नया गांव की रहने वाली 17 वर्षीय आशी यादव को बचपन से ही खेलों में रुचि थी। स्कूल प्रतियोगिताओं में सफलता मिलने के बाद उन्होंने एथलेटिक्स में करियर बनाने का फैसला किया। हालांकि शुरुआत में परिवार ने इसका विरोध किया और पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी।
इसके बावजूद आशी ने अपने सपनों को नहीं छोड़ा। वह सहेली के घर जाने का बहाना बनाकर स्टेडियम पहुंचती थीं और नियमित रूप से अभ्यास करती थीं। लगातार मेहनत के बल पर उन्होंने राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में 800 मीटर दौड़ में स्वर्ण और 1500 मीटर दौड़ में रजत पदक हासिल किया।
हाल ही में उन्होंने गोवा में आयोजित ओपन नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी भाग लिया। हालांकि इस प्रतियोगिता में उन्हें पदक नहीं मिल सका, लेकिन राष्ट्रीय स्तर का अनुभव उनके लिए नई प्रेरणा बन गया।
आशी के पिता विजेंद्र यादव ऑटो चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। बेटी की सफलता के बाद अब उन्हें उस पर गर्व है। सीमित संसाधनों के बावजूद आशी का लक्ष्य एथलेटिक्स में देश का नाम रोशन करना है।
