शहीद दिवस पर विशेष: 1857 की क्रांति के अग्रदूत प्रथम शहीद मंगल पांडे

बलिया। बलिया की धरती को यूं ही ‘बागी धरती’ नहीं कहा जाता। आजादी की लड़ाई के इतिहास में इस जनपद ने 1857 की क्रांति से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक जिस साहस, जोश और बलिदान का परिचय दिया, उसने इसे राष्ट्रव्यापी पहचान दिलाई। 1942 में अंग्रेजी शासन से सबसे पहले मुक्त होने वाले जिलों में शामिल बलिया की क्रांतिकारी चेतना की आधारशिला 1857 में ही यहां के सपूत मंगल पांडे ने रख दी थी।

मंगल पांडे का जन्म 30 जनवरी 1831 को तत्कालीन गाजीपुर जिले की बलिया तहसील के नगवा गांव में हुआ था, जो बाद में बलिया जिले का हिस्सा बना। उनके पिता का नाम सुदिष्ट पांडे और माता का नाम जानकी देवी था। कम उम्र से ही उनमें गंभीरता और वीरता के गुण दिखाई देते थे। महज 18 वर्ष की आयु में वह अंग्रेजी सेना की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में भर्ती हो गए।

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बैरकपुर छावनी में तैनाती के दौरान 1857 में कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी के इस्तेमाल की खबर ने भारतीय सैनिकों में रोष भर दिया। यह मामला धार्मिक आस्था से जुड़ा था, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों में असंतोष फैल गया। मंगल पांडे ने इसे अपने स्वाभिमान और धर्म पर आघात माना।

29 मार्च 1857 को बैरकपुर के परेड मैदान में मंगल पांडे ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने अपने साथियों को ललकारते हुए अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान किया। इसी दौरान उन्होंने अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बाफ और ह्यूसन पर गोली चलाई, जिससे दोनों गंभीर रूप से घायल हुए। इसके बाद तलवार से भी उन्होंने अंग्रेज अफसरों पर हमला किया।

हालांकि उस समय उनके साथ मौजूद कई भारतीय सैनिकों ने खुलकर साथ नहीं दिया, लेकिन मंगल पांडे की यह कार्रवाई 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पहली निर्णायक चिनगारी साबित हुई। अंग्रेजी शासन ने इसे गंभीर चुनौती माना और उन्हें गिरफ्तार कर सैनिक अदालत में पेश किया गया।

8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर में मंगल पांडे को फांसी दे दी गई। उनके बलिदान ने पूरे देश में विद्रोह की आग को और तेज कर दिया। इसके बाद 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुआ व्यापक विद्रोह देश के कई हिस्सों में फैल गया।

मंगल पांडे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे पहले सिपाही माने जाते हैं, जिन्होंने अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाकर प्रत्यक्ष विद्रोह का बिगुल फूंका। उनके बलिदान ने न केवल 1857 की क्रांति को जन्म दिया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आजादी की राह भी प्रशस्त की।

बलिया की बागी परंपरा में मंगल पांडे का नाम आज भी प्रेरणा, साहस और देशभक्ति का प्रतीक है। उनका बलिदान भारतीय इतिहास में प्रथम शहीद के रूप में सदैव अमर रहेगा।

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