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कॉरपोरेट से राजनीति तक: जब बिजनेस लीडर्स ने चुनी जनसेवा की राह
भारतीय लोकतंत्र की खासियत उसकी विविधता है। संसद और विधानसभाओं में समाज के अलग-अलग वर्गों से आए लोग जनप्रतिनिधि बनते हैं। पिछले कुछ वर्षों में एक नया रुझान तेजी से उभरा है—कॉरपोरेट जगत के सफल उद्यमी भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं। कारोबार की दुनिया से आने वाले ये लोग अपने साथ प्रबंधन कौशल, आर्थिक समझ और दीर्घकालिक दृष्टि लेकर आते हैं, जो नीति-निर्माण में नई सोच जोड़ सकती है।
देश के उद्योग जगत से राजनीति में आए प्रमुख चेहरों में नवीन जिंदल का नाम भी लिया जाता है। जिंदल स्टील एंड पावर समूह से जुड़े जिंदल ने संसद में ऊर्जा और अवसंरचना से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता से अपनी बात रखी। इसी तरह तकनीकी उद्यमी से केंद्रीय मंत्री बने राजीव चंद्रशेखर ने डिजिटल इंडिया, साइबर सुरक्षा और डेटा संप्रभुता जैसे विषयों पर अपनी विशेषज्ञता का उपयोग किया।
क्षेत्रीय राजनीति में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। अरविंद खन्ना ने उद्योग जगत के अनुभव को सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल करते हुए एमएसएमई क्षेत्र की मजबूती के लिए काम किया। असम में बदरुद्दीन अजमल ने अपने व्यवसायिक अनुभव के आधार पर एआईयूडीएफ जैसी राजनीतिक पार्टी खड़ी की, जो राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वहीं दक्षिण भारत में के. पंडियाराजन ने शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में अपने कॉरपोरेट अनुभव का उपयोग किया।
राजनीति में कुछ लोग चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो कुछ रणनीतिक भूमिका निभाते हैं। इस संदर्भ में राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का नाम भी उल्लेखनीय है। पीआर 24x7 के संस्थापक और सामाजिक कार्यों से जुड़े मलिकराम ने डिजिटल मंचों के जरिए क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास किया है। इंदौर में बुजुर्गों के लिए डे-केयर सेंटर जैसी पहल उनके सामाजिक सरोकारों को भी दर्शाती है।
इसी क्रम में व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधि प्रवीण खंडेलवाल जैसे नेता भी सामने आए हैं, जिन्होंने देश के छोटे व्यापारियों और दुकानदारों की आवाज को नीति-निर्माण तक पहुंचाने का प्रयास किया।
हालांकि इस प्रवृत्ति के साथ एक बहस भी जुड़ी रहती है—क्या व्यापारिक हित और राष्ट्रहित हमेशा एक साथ चल सकते हैं? आलोचकों का मानना है कि हितों के टकराव की आशंका बनी रहती है। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
फिर भी कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कारोबारी जगत से आए लोग अपनी दक्षता और अनुभव को जनसेवा में लगाते हैं, तो इससे निवेश, रोजगार और आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
