सीआईआई ने ‘हर आखिरी लड़की’ पुस्तक के विमोचन अवसर पर संवाद का आयोजन किया

लखनऊ। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बालिकाओं की शिक्षा पर केंद्रित पुस्तक ‘हर आखिरी लड़की: भारत की भूली-बिसरी बेटियों को शिक्षित करने की यात्रा’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने बालिका शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार साझा किए।

कार्यक्रम में एजुकेट गर्ल्स की संस्थापक सफीना हुसैन और उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा (आईएएस) के बीच संवाद हुआ। चर्चा का संचालन शिक्षा विशेषज्ञ और लखनऊ बायोस्कोप सनतकदा ट्रस्ट की ट्रस्टी डॉ. नूर खान ने किया।

यह भी पढ़े - प्रभारी औषधि निरीक्षक की जांच में अनियमितता उजागर, मेडिकल स्टोर बंद, नोटिस की तैयारी

कार्यक्रम में बताया गया कि एजुकेट गर्ल्स की शुरुआत वर्ष 2007 में राजस्थान के कुछ गांवों से हुई थी, जो अब 30,000 से अधिक गांवों तक फैल चुकी है। संस्था के अनुसार, 55,000 से अधिक स्वयंसेवकों के सहयोग से अब तक 20 लाख से अधिक स्कूल से बाहर की लड़कियों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा गया है। वर्ष 2025 में एजुकेट गर्ल्स को रामोन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिससे यह सम्मान पाने वाली भारत की पहली संस्था बनी।

पुस्तक के विमोचन के दौरान सफीना हुसैन ने कहा कि यह पुरस्कार संस्था के कार्यों को व्यापक स्तर पर सामने लाने का अवसर है। उन्होंने कहा कि बालिका शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति को साझा करना और आगे की चुनौतियों पर ध्यान देना जरूरी है। उन्होंने बताया कि संस्था का लक्ष्य वर्ष 2035 तक एक करोड़ शिक्षार्थियों तक पहुंचने का है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि लड़कियां दसवीं कक्षा तक शिक्षा पूरी नहीं कर पातीं, तो वे बड़े पैमाने पर मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से बाहर रह जाती हैं।

डॉ. नूर खान ने कहा कि नामांकन बढ़ने के बावजूद अब भी बड़ी संख्या में लड़कियां स्कूल से बाहर हैं और इस अंतर को पाटने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।

अतिरिक्त मुख्य सचिव पार्थ सारथी सेन शर्मा ने राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में शिक्षा की स्थिति पर बात करते हुए कहा कि पिछले दशकों में लिंग समानता के आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि जहां पहले लिंग समानता सूचकांक काफी कम था, वहीं अब यह कई क्षेत्रों में संतुलन की स्थिति में पहुंच गया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बड़े आंकड़े जमीनी हकीकत की पूरी कहानी नहीं बताते और इसके लिए व्यक्तिगत अनुभवों और कहानियों को समझना जरूरी है।

वक्ताओं ने कहा कि ‘हर आखिरी लड़की’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि जब समुदाय, स्थानीय नेतृत्व और संस्थाएं मिलकर काम करती हैं, तो बालिकाओं की शिक्षा में ठोस बदलाव संभव है।

खबरें और भी हैं

Copyright (c) Parakh Khabar All Rights Reserved.