बुलबुले फेस्टिवल 2025: बच्चों की कल्पना, खेल और सृजन का उत्सव

लखनऊ, नवंबर 2025 : लखनऊ का पहला कला एवं सांस्कृतिक बाल उत्सव ‘बुलबुले फेस्टिवल 2025’ 7 व 8 नवम्बर को इंडिया लिटरेसी हाउस, लखनऊ में दो दिनों की रचनात्मकता, खेल और जिज्ञासा से भरी रंगीन यात्रा के साथ संपन्न हुआ। स्वतंत्र तालीम फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस तीसरे संस्करण ने एक बार फिर बच्चों, शिक्षकों, कलाकारों और शिक्षाविदों को एक साझा मंच पर लाकर सृजन और कल्पना की भावना का उत्सव मनाया।

उत्सव का शुभारंभ नृत्य (कथक), संगीत (तबला), एनीमेशन आदि पर आधारित विभिन्न कार्यशालाओं से हुआ, जिसने पूरे वातावरण में सीखने और खोज की लय भर दी। ‘एक्सप्लोरेशन ज़ोन’ बच्चों की जिज्ञासा का केंद्र बना, जहाँ कठपुतली निर्माण, विज्ञान-आधारित "आहा!" प्रयोगों तथा इतिहास से जुड़ी प्रदर्शनी में बच्चों ने वस्तुओं की यात्रा को जाना। सिक्कों और गाड़ियों से लेकर चलचित्रों के विकास तक सब कुछ बच्चों की दृष्टि और सहभागिता के माध्यम से रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया।

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स्वतंत्र तालीम फाउंडेशन के सह-संस्थापक राहुल ने कहा, “600 से अधिक बच्चों को खुले मन से खेलते देखना अद्भुत था। जब बच्चों से पूछा गया कि उन्हें उत्सव में सबसे अच्छा क्या लगा, तो उन्होंने कहा ‘मुक्त खेल’। सभी बच्चों को खेलने के लिए पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।”

उत्सव की प्रमुख झलकियों में से एक थी ‘आर्टिस्ट म्यूज़ियम’। एक अनुभवात्मक और इंटरएक्टिव स्थल, जहाँ बच्चों ने भारत और विश्वभर के कलाकारों की कहानियों और रचनाओं के साथ संवाद किया। इसने रचनात्मकता और प्रेरणा पर नई दृष्टि प्रस्तुत की। शाम के समय कठपुतली प्रस्तुतियाँ सैपलिंग्स, झिलमिल जंक्शन और फ्रेंड्स फॉरएवर तथा बहुप्रतीक्षित ‘पपेट परेड’ ने वातावरण को जीवंत कर दिया। प्रत्येक विद्यालय ने गर्व से अपने बाँस से बने विशाल पशु कठपुतलों को प्रदर्शित किया जो सच-मुच और रूपक दोनों अर्थों में बच्चों की सामूहिक सृजनशीलता की रोशनी से जगमगा रहे थे।

शिक्षकों के लिए विशेष कार्यशाला ‘कठपुतली के माध्यम से सीखना’ विषय पर पार्थ पॉल (बर्दवान द पपेटियर्स) द्वारा संचालित की गई, जिसमें शिक्षकों ने रचनात्मक शिक्षण और कहानी कहने की नई विधियों को समझा। कबीर थिएटर में लगी बच्चों की प्रदर्शनी ने उनकी बढ़ती जिज्ञासा और निर्माण की चाह को सुंदर रूप से अभिव्यक्त किया। साथ ही, यह दिखाया कि कैसे बच्चों की स्वतंत्र खोजों ने शिक्षकों को भी इस रचनात्मक यात्रा का सहभागी बना दिया।

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इस वर्ष के संस्करण के लिए स्वतंत्र तालीम फाउंडेशन ने बचपन मनाओ (बेंगलुरु स्थित एकस्टेप फाउंडेशन की पहल) के साथ साझेदारी की। बचपन मनाओ पहल का उद्देश्य 0-8 वर्ष के बच्चों के शुरुआती वर्षों में खेल और आनंद के माध्यम से सीखने और विकास का उत्सव मनाना है। यह पहल देशभर में 100 से अधिक “कोलैब-एक्टर्स” के साथ एक बढ़ता हुआ समुदाय है, जो बच्चों के आस-पास के वयस्कों को प्रेरित और सक्षम बनाकर हर बच्चे को समग्र बचपन का अनुभव दिलाने की दिशा में काम कर रहा है।

एकस्टेप फाउंडेशन की नीति एवं साझेदारी निदेशक हिता कुमार ने कहा, “बचपन के पहले आठ वर्ष अत्यंत समृद्ध होते हैं- सबसे तेज़ विकास, सबसे अधिक जिज्ञासा और दुनिया से सहज जुड़ाव का समय। ‘बचपन मनाओ’ इसी सहजता और समृद्धि को समझने और मनाने का एक प्रयास है।”

स्वतंत्र तालीम फाउंडेशन की सह-संस्थापक रिद्धि ने कहा, “बुलबुले फेस्टिवल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे समुदाय मिलकर रचता है, जिसके तहत शिक्षक, अभिभावक, कलाकार, पड़ोसी सभी एक साझा भावना से जुड़ते हैं। यह उत्सव बच्चों द्वारा और बच्चों के लिए जीवंत हुआ है।”

बुलबुले फेस्टिवल 2025 ने यह दर्शाया कि बच्चे खेल के माध्यम से सबसे प्रभावी रूप से सीखते हैं। यह सिर्फ पढ़ाई का नहीं, बल्कि संपूर्ण विकास रचनात्मकता, सामाजिक जुड़ाव, भावनात्मक अभिव्यक्ति और कहानियों के माध्यम से जीवन को समझने का उत्सव बना।

एक युवा स्वयंसेवक विजय ने कहा, “मैंने कुछ साल पहले स्वतंत्र तालीम के मेकर्स्पेस में पढ़ाई की थी। आज मैं उसी संस्था के बुलबुले फेस्टिवल में स्वयंसेवक हूँ। अब मैं डिज़ाइन की पढ़ाई कर रहा हूँ और बच्चों के साथ सीखने का यह अनुभव मेरे लिए बेहद प्रेरक रहा।”

संगीत कार्यशाला का संचालन करने वाले तबला गुरु तुषार ने कहा, “बच्चे किसी भी चीज़ से संगीत बना सकते हैं- हाथों, पैरों, यहाँ तक कि अपनी छाती से भी। उनका कल्पनालोक असीमित है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को स्वतंत्र रूप से सीखने और खोजने दें संगीत जैसे माध्यम बच्चे के समग्र विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”

बुलबुले फेस्टिवल 2025 के समापन के साथ ही पूरा परिसर हँसी, संगीत और रचनात्मक ऊर्जा से गूँज उठा। इस उत्सव ने एक बार फिर यह विश्वास जगाया कि जब बच्चों को सृजनकर्ता और विचारक के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो वे न केवल कला बल्कि सीखने के मायनों को भी बदल सकते हैं।

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