सुरहा ताल : प्रकृति, इतिहास और आस्था का अद्भुत संगम, अब बना अंतरराष्ट्रीय पहचान का केंद्र

बलिया : प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और ऐतिहासिक महत्व से समृद्ध सुरहा ताल आज न केवल पूर्वांचल की धरोहर है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुका है। भौगोलिक दृष्टि से सुरहा ताल एक प्राकृतिक जलाशय है, जिसका निर्माण गंगा नदी के पुराने प्रवाह से बने गोखुर (ऑक्सबो) झील के रूप में माना जाता है।

अमरनाथ मिश्र पीजी कॉलेज, दुबेछपरा के पूर्व प्राचार्य एवं पर्यावरणविद् डॉ. गणेश पाठक के अनुसार, शोध अध्ययनों से संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में गंगा नदी सुरहा ताल क्षेत्र से होकर बहती थी और आगे रेवती के पास सरयू नदी में मिलती थी। समय के साथ नदी की धारा बदल गई और उसके पुराने मार्ग के अवशेष के रूप में सुरहा ताल का निर्माण हुआ। कटहल नाला आज भी गंगा के उसी पुराने प्रवाह की याद दिलाता है।

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लगभग 5 किलोमीटर चौड़े सुरहा ताल में वर्षभर जल भरा रहता है। सामान्य दिनों में इसका क्षेत्रफल करीब 24 वर्ग किलोमीटर रहता है, जो बरसात में बढ़कर 42 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच जाता है। वहीं गर्मियों में इसका क्षेत्रफल घटकर लगभग 21 वर्ग किलोमीटर रह जाता है।

नेपाल नरेश सुरथ से जुड़ी है लोककथा

सुरहा ताल से जुड़ी एक प्रसिद्ध किंवदंती भी स्थानीय जनमानस में प्रचलित है। कहा जाता है कि नेपाल के राजा सुरथ युद्ध में पराजित होने के बाद इस क्षेत्र में आकर रहने लगे थे। वे कुष्ठ रोग से भी पीड़ित थे। मान्यता है कि सुरहा ताल में नियमित स्नान और इसकी तलहटी की मिट्टी शरीर पर लगाने से उनका रोग ठीक हो गया।

रोगमुक्त होने के बाद राजा सुरथ ने ताल और गंगा के पुराने मार्ग का पुनरुद्धार कराया। क्षेत्र को जलभराव से बचाने के उद्देश्य से जल निकासी की व्यवस्था विकसित की गई। इसी से जुड़े नाले को पहले "कष्टहर" कहा गया, जिसका अर्थ है कष्ट दूर करने वाला। कालांतर में यही नाम अपभ्रंश होकर "कटहल नाला" बन गया।

बाढ़ और जलभराव से बचाता है कटहल नाला

कटहल नाला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सुरहा ताल और गंगा नदी के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखता है। जब सुरहा ताल क्षेत्र में जलस्तर बढ़ता है तो अतिरिक्त पानी इसी नाले के माध्यम से गंगा में चला जाता है। वहीं गंगा में बाढ़ आने पर उसका अतिरिक्त जल सुरहा ताल क्षेत्र में फैलकर दबाव कम करता है। इस प्रकार यह नाला बाढ़ और जलप्लावन दोनों स्थितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

'सुरथ ताल' से 'सुरहा ताल' तक

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, नेपाल नरेश सुरथ के नाम पर इस ताल का नाम पहले 'सुरथ ताल' पड़ा। समय के साथ यह 'सुरथा ताल' और फिर अपभ्रंश होकर 'सुरहा ताल' कहलाने लगा।

आज सुरहा ताल अपनी जैव विविधता, प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिक महत्व के कारण देश-विदेश में पहचान बना चुका है। देश के 100वें रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद इसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और बढ़ी है। आने वाले समय में सुरहा ताल के एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने की उम्मीद है, जो बलिया के आर्थिक और पर्यटन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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