परोपकार ही सबसे बड़ा प्रतिफल

मनुष्य अक्सर यह सोचकर व्यथित हो जाता है कि उसने दूसरों के लिए इतना कुछ किया, लेकिन बदले में उसे क्या मिला। परंतु प्रकृति हमें सिखाती है कि सच्चा उपकार कभी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता। बादल बिना किसी स्वार्थ के धरती पर जल बरसाते हैं, नदियाँ खेतों को सींचकर हरियाली देती हैं, पृथ्वी जीवनभर हमारा भार सहती है और वृक्ष हमें फल, छाया व लकड़ी प्रदान करते हैं। फिर भी वे किसी प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखते।

युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार, "परोपकार स्वयं ही एक बदला है।" त्याग और सेवा पहली दृष्टि में घाटे का सौदा लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में यही मनुष्य को आंतरिक शांति, संतोष और महानता प्रदान करते हैं। उपकारी व्यक्ति जानता है कि उसके कार्यों से जितना लाभ दूसरों को होता है, उससे कहीं अधिक लाभ उसका स्वयं का होता है।

ज्ञानवान व्यक्ति अपनी उपलब्धियों और संसाधनों को समाज के साथ साझा करते हैं। वे समझते हैं कि जब प्रकृति जीवन जैसी अमूल्य देन निःशुल्क प्रदान करती है, तो हमें भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

विपरीत परिस्थितियों और कठिन समय में भी परोपकार का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। किसी की सहायता करना, त्याग करना या जरूरतमंद को सहयोग देना वास्तव में एक ऐसी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसका प्रतिफल भविष्य में कई गुना होकर लौटता है। जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वह हमारी संचित पुण्य-पूंजी के रूप में सुरक्षित हो जाता है।

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