पति की पेशी सुनिश्चित कराने का जरिया नहीं है बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका : इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भरण-पोषण मामले में वारंट से बच रहे पति की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका का उपयोग नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में संबंधित परिवार न्यायालय ही बाध्यकारी और दंडात्मक उपाय अपनाने के लिए सक्षम है। 

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए संगीता यादव की याचिका खारिज कर दी। याचिका में महिला ने अपने पति का पता लगाकर उसे गिरफ्तार कर परिवार न्यायालय या हाईकोर्ट के समक्ष पेश करने का अनुरोध किया था। 

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मामले के अनुसार, जनवरी 2021 में आजमगढ़ की परिवार अदालत ने पति को पत्नी और बेटी को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। आरोप है कि पति ने न तो गुजारा भत्ता दिया और न ही वह अदालत में पेश हो रहा था। परिवार अदालत की ओर से जारी वारंट से भी वह बच रहा था। बकाया राशि करीब 3.44 लाख रुपये बताई गई। 

महिला ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि पति को खोजकर गिरफ्तार किया जाए और परिवार अदालत को सौंपा जाए, ताकि बकाया भरण-पोषण की वसूली की जा सके।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इस आधार पर कि पति वारंट से बच रहा है, हैबियस कॉर्पस जैसी राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि यदि पति पेश नहीं हो रहा है तो परिवार अदालत को ही उसके खिलाफ सभी बाध्यकारी उपाय अपनाने चाहिए। 

अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उद्देश्य अवैध हिरासत से मुक्ति दिलाना होता है, न कि किसी व्यक्ति की अदालत में पेशी सुनिश्चित कराना। 

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