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विश्व पर्यावरण दिवस पर गोडावण संरक्षण का संदेश, कुतुब मीनार पर दिखी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की प्रेरक कहानी
नई दिल्ली। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर 5 जून की शाम राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक कुतुब मीनार परिसर में भारत के सबसे दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के संरक्षण और पुनर्वास की प्रेरक कहानी को विशेष प्रोजेक्शन शो के माध्यम से प्रदर्शित किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य लोगों को इस विलुप्तप्राय पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूक करना और इसके महत्व को व्यापक स्तर पर पहुंचाना था।
विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में गोडावण एस्ट्यूरी प्रीमियम वॉटर के सहयोग से कुतुब मीनार पर भव्य प्रोजेक्शन शो प्रस्तुत किया गया। शो के माध्यम से गोडावण की जीवन यात्रा, संरक्षण चुनौतियों और उसके पुनरुत्थान के प्रयासों को दर्शाया गया।
गोडावण को राष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान तब मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 133वें एपिसोड में इसका उल्लेख करते हुए इसे भारत में वन्यजीव संरक्षण के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण की आवश्यकता पर विशेष बल दिया।
ग्रामोदय सामाजिक संस्थान के अध्यक्ष केदार श्रीमाल ने कहा कि गोडावण संरक्षण अभियान की सबसे बड़ी विशेषता विभिन्न हितधारकों का साझा प्रयास है। स्थानीय समुदायों, संरक्षण विशेषज्ञों, निजी संस्थानों, वन विभाग और सरकारी एजेंसियों के समन्वित प्रयासों से इस दुर्लभ पक्षी और उसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा को मजबूती मिल रही है।
उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास न केवल जनजागरूकता बढ़ा रहे हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए एक प्रभावी मॉडल भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे गोडावण के भविष्य को लेकर सकारात्मक उम्मीदें मजबूत हुई हैं।
उल्लेखनीय है कि राजस्थान ने मई 2026 में पहली बार राज्य स्तर पर ‘गोडावण दिवस’ मनाया। 21 मई को आयोजित इस विशेष दिवस का उद्देश्य गोडावण संरक्षण से जुड़े प्रयासों को जन-जन तक पहुंचाना और लोगों को इस अभियान से जोड़ना था। इस दौरान वन्यजीव विभाग और संरक्षण संगठनों ने प्रजनन एवं हैचरी कार्यक्रमों में मिली सफलता की जानकारी भी साझा की। संरक्षित केंद्रों में नए चूजों के जन्म ने संरक्षण अभियान को नई ऊर्जा प्रदान की है।
गोडावण की संख्या में सुधार के पीछे वैज्ञानिक शोध, आधुनिक संरक्षण तकनीकों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी की अहम भूमिका रही है। संरक्षण संगठनों ने प्राकृतिक घास के मैदानों के पुनर्विकास, घोंसला स्थलों की सुरक्षा, जल स्रोतों की उपलब्धता बढ़ाने और प्रजनन कार्यक्रमों को मजबूत करने जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
इसके अलावा, शिकारी जीवों के खतरे को कम करने, अंडों और नवजात चूजों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने तथा विशेष हैचरी सुविधाओं के विकास पर भी व्यापक कार्य किया गया है।
इस अभियान में विशेष रूप से बिश्नोई समुदाय और गोडावण के प्राकृतिक आवास क्षेत्रों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों की भूमिका उल्लेखनीय रही है। स्थानीय लोगों ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ मिलकर घोंसलों की निगरानी, प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और पक्षियों के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि सामूहिक प्रयासों और जनभागीदारी के बल पर गोडावण की वापसी की उम्मीद पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है, जो भारत के वन्यजीव संरक्षण अभियान के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
