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जनजातीय संस्कृति का उत्सव बनेगा ‘जात्रा–2026’, इंदौर में तीन दिन सजेगा परंपरा और पहचान का रंगीन संसार
इंदौर, जनवरी 2026: जनजातीय संस्कृति किसी समुदाय की केवल पहचान नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियों, जीवनशैली और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की सजीव अभिव्यक्ति होती है। इसी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और नई पीढ़ी से संवाद के उद्देश्य से ‘जात्रा–2026’ का आयोजन किया जा रहा है। यह तीन दिवसीय सांस्कृतिक महोत्सव 20 से 22 फरवरी 2026 तक देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के ऐतिहासिक गांधी हॉल परिसर में आयोजित होगा।
उन्होंने बताया कि इस महोत्सव के माध्यम से जनजातीय समाज की परंपरागत जीवनशैली, खान-पान, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और कलात्मक अभिव्यक्तियों को एक समेकित और जीवंत स्वरूप में प्रस्तुत किया जाएगा। जनजातीय समाज के प्रमुख पर्व भगौरिया से ठीक एक सप्ताह पूर्व आयोजित यह आयोजन सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है और इंदौर सहित पूरे संभाग में उत्सव, सहभागिता और सांस्कृतिक संवाद का सकारात्मक माहौल बनाएगा।
इस भव्य आयोजन में देश की प्रतिष्ठित पब्लिक रिलेशन्स कंपनी पीआर 24×7 मीडिया पार्टनर के रूप में सहभागी है। वहीं, प्रदेश की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालित जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी भी इस दिशा में अहम भूमिका निभा रही है। ‘जात्रा–2026’ इसी सांस्कृतिक अभियान की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो जनजातीय लोककला, बोली, परंपरा और पहचान के संरक्षण एवं संवर्धन को समर्पित है।
तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में दर्शकों को जनजातीय जीवन की विविध और रंगीन झलकियां एक ही परिसर में देखने को मिलेंगी। पारंपरिक रंगों, लोक सुरों और विशिष्ट स्वादों से सजा यह महोत्सव जनजातीय समाज की आत्मा से साक्षात्कार कराने का माध्यम बनेगा।
‘जात्रा–2026’ के प्रमुख आकर्षण होंगे:
जनजातीय कलाकारों की कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी
जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों के विशेष स्टॉल
विभिन्न अंचलों के जनजातीय नृत्य एवं लोक प्रस्तुतियां
जनजातीय जीवन और परंपरा को दर्शाती ‘पिथोरा’ आर्ट गैलरी
जनजातीय पर्व भगौरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी
जनजातीय साहित्य और लोक कथाओं का प्रदर्शन
कुल मिलाकर, ‘जात्रा–2026’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की विरासत, पहचान और आत्मसम्मान का भव्य उत्सव बनकर उभरेगा, जो परंपरा और वर्तमान के बीच एक सशक्त सेतु का कार्य करेगा।
