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विकास और दरकते पहाड़
दीपावली के दिन उत्तराखंड के उत्तरकाशी में बड़ा हादसा हो गया। चारधाम परियोजना के तहत निर्माणाधीन सिलक्यारा-पोल गांव में सुरंग धसने से 40 मजदूर फंस गए। राहत की बात है कि सभी मजदूर जीवित हैं और उन्हें सकुशल बाहर निकालने के लिए रेसक्यू ऑपरेशन जारी है। सुरंग का करीब पंद्रह मीटर हिस्सा धंस गया।
यह बात अपनी जगह बिल्कुल सही है कि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना उन्नति की कल्पना करना बेमानी है। इनकी पूर्ति से न केवल आर्थिक विकास के द्वार खुलते हैं,बल्कि क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार की संभावनाएं भी बनती हैं,लेकिन पर्यावरण या जन हानि के बगैर यह कार्य हो तो सही अर्थों में उन्नति की राह आसान हो जाती है, क्योंकि जब पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तभी हम स्वस्थ जीवन की कल्पना कर सकेंगे। गौरतलब है कि उत्तराखंड लंबे समय से भूस्खलन से प्रभावित हो रहा है,जो वहां के लोगों के पलायन की भी बड़ी वजह बनकर उभर रहा है।
बताया जा रहा है कि यह हादसा भी भूस्खलन की वजह से हुआ। इसी साल मार्च में भी इस सुरंग का एक हिस्सा धंस गया था, मगर गनीमत रही कि उसमें कोई हताहत नहीं हुआ। उत्तराखंड में धंसते पहाड़ों को लेकर कई बार पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों द्वारा चेताया जा चुका है। इस योजना का भी पर्यावरणविद शुरू से ही विरोध कर रहे हैं,उनका कहना है कि इससे पहाड़ों पर भूस्खलन तेजी से बढ़ेगा जिससे जानमाल का बड़ा नुकसान हो सकता है।
इस बात से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि पहाड़ों पर चालू बेलगाम विकास परियोजनाएं और अपने स्वार्थ के लिए कहीं पर भी पहाड़ों को काट देना पहाड़ों को दिन पर दिन खोखला करता जा रहा है। स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि जरा से कंपन या तेज बारिश से पहाड़ खिसक जाते हैं जिसकी वजह से पहाड़ों पर बड़े हादसे का सदैव खतरा बना रहता है।
हाल में ही बारिश के मौसम कई बार पहाड़ के धंसने जैसी घटनाएं सामने आई थीं। हमको समझना होगा कि बेशक विकास आवश्यक है,लेकिन ऐसे विकास का कोई अर्थ नहीं रह जाता जो पहाड़ों को नुकसान पहुंचाकर किया जाए,क्योंकि जब पहाड़ जैसी अमूल्य निधि ही नहीं रहेगी तो हम विकास का क्या करेंगे?
