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शहरी विकास की चुनौती
वास्तव में 21वीं सदी शहरी विकास की सदी होगी जिसे वैश्विक शहरी आबादी में भारी वृद्धि से पहचाना जाएगा। वैश्विक स्तर पर शहर स्थानीय क्षेत्र की योजनाओं के साथ-साथ रणनीतिक योजनाओं एवं परियोजनाओं को विकसित करने की ओर बढ़ रहे हैं। भारत भी तीव्र शहरीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है।
वायु एवं जल प्रदूषण,जलवायु परिवर्तन, बाढ़ और चरम गर्मी जैसे नकारात्मक बाह्य कारक शहरी अवसंरचना के आर्थिक मूल्य को प्रभावित करते हैं। जलवायु संकट इनसे संबद्ध जोखिमों को और बढ़ा देगा। बात चाहे सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा 14 शहरों के प्रदूषण संबंधित किए गए सर्वेक्षण की हो या फिर विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के कारण शहरों के बुरे तरीके से प्रभावित होने की, हर आपदा तेजी से हो रहे शहरीकरण की प्रक्रिया में हुई गलतियों को उजागर कर देती है। बड़े शहरों में विशाल शहरी ढांचा विकसित हुआ है।
इसके साथ ही आवासीय और कार्यालयीन निर्माण में अचानक तेजी आने से पहले से ही भीड़भाड़ वाले शहरों में आबादी का दबाव और बढ़ेगा। इसकी कीमत वायु प्रदूषण के रूप में चुकानी पड़ रही है। पानी की आपूर्ति और गंदगी का निस्तारण और बड़े मुद्दे बन जाएंगे। दिल्ली से मेरठ जाने के लिए हाईस्पीड रेल लाइन हाल ही में शुरू हुई है।
अलवर आदि अन्य शहरों के लिए ऐसी अन्य लाइन बिछाने की योजना है। कल्पना कीजिए कि और तेज परिवहन के साथ इस दूरी में भी विस्तार होगा। इसलिए आवश्यक है कि शहर एक सतत एवं जलवायु अनुकूल भविष्य के लिए तैयार हों। समझना होगा कि भारत को एक व्यापक एवं एकीकृत शहरी नियोजन की आवश्यकता क्यों है? ध्यान रहे शहरी नियोजन आज के इस बढ़ते शहरीकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू हो गया है।
समस्याओं को देखते हुए देश के शहरों के लिए एक ठोस शहरी नियोजन की आवश्यकता है जिसमें वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण पर आधारित मास्टर प्लान की व्यवस्था की गई हो। अब वक्त आ गया है कि देश के शहरों के मामले में हम अब तक प्राप्त नतीजों की तुलना में बेहतर योजनाओं का निर्माण करें।
