क्या 2047 तक ‘विकसित भारत’ की राजनीति ‘विश्वगुरु’ के संकल्प को साकार कर पाएगी? — डॉ. अतुल मलिकराम

जब भारत 2047 में स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे करेगा, तब यह केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं होगा, बल्कि अपने राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक सफ़र का गंभीर आत्म-मूल्यांकन भी होगा। यह पड़ताल सिर्फ़ आर्थिक उपलब्धियों—सड़कें, इमारतें या विकास दर—तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी देखेगी कि लोकतांत्रिक मूल्य, सामाजिक संतुलन और वैश्विक भूमिका किस दिशा में विकसित हुई। इसी संदर्भ में ‘विकसित भारत’ और ‘विश्वगुरु भारत’ जैसे नारे सामने आते हैं—जो उम्मीद भी जगाते हैं और गहरे प्रश्न भी खड़े करते हैं।

आज सार्वजनिक विमर्श में यह धारणा प्रबल है कि भारत न केवल एक विकसित राष्ट्र बनेगा, बल्कि विश्व को दिशा देने वाला ‘विश्वगुरु’ भी बनेगा। यह विचार भावनात्मक रूप से आकर्षक है, क्योंकि यह अतीत के गौरव और भविष्य की आकांक्षा को एक सूत्र में पिरोता है। लेकिन इतिहास और राजनीति दोनों सिखाते हैं कि बड़े नारे तभी टिकते हैं, जब उनके पीछे ठोस रणनीति, व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और मज़बूत संस्थागत आधार हो। इसलिए ‘विश्वगुरु’ की अवधारणा को भावना नहीं, बल्कि व्यावहारिक यथार्थ के धरातल पर परखना आवश्यक है।

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स्वतंत्रता के बाद भारत की यात्रा आसान नहीं रही। उपनिवेशवाद की विरासत, व्यापक गरीबी, अशिक्षा और गहरी सामाजिक विषमताओं के बावजूद भारत ने लोकतंत्र को न केवल अपनाया, बल्कि उसे जीवित भी रखा। आर्थिक सुधारों के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति मज़बूत हुई। आज भारत अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, डिजिटल तकनीक और नवाचार में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी बात सुनी जाती है। ये संकेत ‘विकसित भारत’ की दिशा में प्रगति दिखाते हैं।

लेकिन ‘विश्वगुरु’ बनना केवल आर्थिक आँकड़ों या तकनीकी क्षमता का प्रश्न नहीं है। विश्वगुरु वही हो सकता है जो ज्ञान का स्रोत बने, नैतिक दिशा दे और अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करे। प्राचीन भारत की स्मृति—नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय, बौद्ध और जैन दर्शन, योग और आयुर्वेद—आज भी दुनिया को प्रेरित करते हैं। किंतु आधुनिक विश्व में नेतृत्व के लिए अतीत का स्मरण पर्याप्त नहीं; प्रश्न यह है कि क्या आज का भारत समकालीन दुनिया को ज्ञान, विचार और नैतिक नेतृत्व देने के लिए तैयार है?

‘विकसित भारत 2047’ का नारा इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह भविष्य को स्पष्ट समयसीमा में बाँधता है। यह सरकारों, नीतिनिर्माताओं और नागरिकों को साझा लक्ष्य देता है—इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीक, सामाजिक कल्याण और आर्थिक सुधारों को एक फ्रेम में जोड़ता है। इससे नागरिक स्वयं को दीर्घकालिक राष्ट्रीय परियोजना का सहभागी महसूस करते हैं, न कि तात्कालिक राजनीतिक बहसों के दर्शक।

फिर भी किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति नारों में नहीं, उसके संस्थानों में होती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय और प्रशासन—यही वे स्तंभ हैं जिन पर विकसित भारत की इमारत खड़ी होगी। शिक्षा के बिना ज्ञान-आधारित समाज संभव नहीं, और ज्ञान के बिना ‘विश्वगुरु’ का दावा खोखला रहता है। भारत में उच्च शिक्षा, शोध और नवाचार को नई प्राथमिकता चाहिए। जब तक विश्वविद्यालय वैश्विक ज्ञान-उत्पादन के केंद्र नहीं बनते, बौद्धिक नेतृत्व सीमित रहेगा।

सामाजिक स्तर पर चुनौती उतनी ही गंभीर है। भारत की विविधता उसकी शक्ति है, लेकिन यदि यह असमान अवसरों और सामाजिक दूरी में बदल जाए, तो विकास की नींव कमजोर पड़ती है। विश्वगुरु वही हो सकता है जो अपने समाज के भीतर न्याय, समरसता और संवाद सुनिश्चित करे। यदि विकास का लाभ कुछ वर्गों तक सिमट गया, तो ‘विकसित भारत’ की अवधारणा अधूरी रह जाएगी।

वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका हाल के वर्षों में अधिक सक्रिय और संतुलित हुई है—वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बनना, बहुपक्षीय मंचों पर पहल करना और रणनीतिक संतुलन साधना सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन वैश्विक नेतृत्व घोषणाओं से नहीं, भरोसे, निरंतरता और आचरण से बनता है। दुनिया उसी देश को मार्गदर्शक मानती है जो भीतर से स्थिर, न्यायपूर्ण और आत्मविश्वासी हो।

अंततः प्रश्न यही है—‘विश्वगुरु’ नारा है या रणनीति? यदि यह केवल भाषणों, प्रतीकों और आत्म-प्रशंसा तक सीमित रहा, तो राजनीतिक अहंकार बन जाएगा। लेकिन यदि इसे शिक्षा, अनुसंधान, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और जिम्मेदार वैश्विक व्यवहार से जोड़ा गया, तो यही अवधारणा भारत को सम्मानित वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जा सकती है।

कोई राष्ट्र स्वयं को गुरु घोषित करके गुरु नहीं बनता। गुरु वही होता है जिसे दुनिया स्वाभाविक रूप से सुनना और स्वीकार करना चाहे। 2047 तक की यात्रा भारत के लिए इसी कसौटी की यात्रा है—जहाँ नारे नहीं, परिणाम बोलें; घोषणाएँ नहीं, संस्थाएँ नेतृत्व करें; और शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि ज्ञान, सहयोग और विश्वास पहचान बनें। तभी ‘विश्वगुरु भारत’ एक स्वाभाविक सच्चाई बनेगा, न कि केवल राजनीतिक दावा।

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