धमकियों के चलते राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में ‘हुन नाथूराम’ के मंचन रद्द

मुंबई: नाटक ‘हुन नाथूराम’ के निर्माताओं ने कहा है कि राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में प्रस्तावित मंचनों को धमकियों और दबाव के चलते मजबूरन रद्द करना पड़ा। निर्माताओं के अनुसार, स्थानीय पुलिस की अनुमति, गुजरात सेंसर प्रमाणपत्र और सर्वोच्च न्यायालय से अनुमति प्राप्त होने के बावजूद भय का माहौल बनने के कारण यह निर्णय लिया गया।

एक बयान में निर्माताओं ने कहा कि वे संवाद और लोकतांत्रिक विमर्श में विश्वास रखते हैं, न कि विघटन में। उन्होंने कहा कि असहमति की स्थिति में आलोचना, कानूनी चुनौती या शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन धमकी या दबाव के जरिए किसी मंचन को रुकवाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

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निर्माताओं ने स्पष्ट किया कि ‘हुन नाथूराम’ प्रलेखित न्यायिक कार्यवाहियों और प्रकाशित सामग्री पर आधारित है। यह नाटक न तो किसी का महिमामंडन करता है और न ही निंदा, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करता है, ताकि दर्शक स्वयं निष्कर्ष निकाल सकें। उन्होंने कहा कि उनकी प्रतिबद्धता सत्यनिष्ठ और जिम्मेदार प्रस्तुति के प्रति है, न कि किसी राजनीतिक पक्ष के प्रति।

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बयान में कहा गया कि विरोध करने वालों को नाटक देखने और उसके बाद आपत्तियां दर्ज कराने के लिए आमंत्रित किया गया था। यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि कोई अंश तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण या आपत्तिजनक पाया जाता है, तो उस पर विधिसम्मत तरीके से विचार किया जाएगा। हालांकि, बिना नाटक देखे ही विरोध का रास्ता चुना गया।

निर्माताओं के अनुसार, पिछले वर्षों में नाटक के 50 से अधिक सफल मंचन हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, जोधपुर सहित कई शहरों में किए जा चुके हैं, जो शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए और दर्शकों तथा समीक्षकों द्वारा सराहे गए।

उन्होंने कहा कि इन रद्द मंचनों से आर्थिक नुकसान हुआ है, कलाकारों और तकनीकी टीम को मानसिक आघात पहुंचा है और उन दर्शकों को निराशा हुई है, जिन्होंने टिकट बुक किए थे। बयान में कहा गया कि यह केवल एक नाटक का मामला नहीं है, बल्कि कलात्मक स्वतंत्रता और संवैधानिक संरक्षण से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।

निर्माताओं ने सरकार और जनप्रतिनिधियों से अपील की है कि वे इस विषय पर संज्ञान लें और कानून के दायरे में काम करने वाले कलाकारों को सुरक्षा और मार्गदर्शन प्रदान करें। साथ ही, रंगमंच समुदाय और नागरिकों से शांतिपूर्ण कलात्मक संवाद के पक्ष में खड़े होने की अपील की गई है।

बयान में कहा गया है कि कला विचार और विमर्श का माध्यम है और उसे भय के वातावरण में नहीं रोका जाना चाहिए।

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