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महाराष्ट्र : पैठणी की 2000 वर्ष पुरानी परंपरा को वैश्विक मंच पर ला रहा ‘कार्या’
मुंबई। महाराष्ट्र की पारंपरिक पैठणी साड़ी की दो हजार वर्ष पुरानी विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से ‘कार्या’ पहल के तहत विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। आयोजकों ने बताया कि यह पहल नासिक के येवला क्षेत्र के कारीगरों और इस प्राचीन रेशमी परंपरा को सामने लाने पर केंद्रित है।
आयोजकों के अनुसार, ‘कार्या’ मंच का उद्देश्य पारंपरिक कारीगरी को फैशन का हिस्सा मात्र नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और रचनात्मक आधार के रूप में प्रस्तुत करना है। इसके तहत देशभर में विभिन्न कारीगरी पर आधारित अध्याय आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें प्रत्येक राज्य की विशिष्ट कला और उससे जुड़े समुदायों को प्रदर्शित किया जा रहा है।

महाराष्ट्र अध्याय में पैठणी साड़ी पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसकी उत्पत्ति दक्कन क्षेत्र में मानी जाती है और जिसे ऐतिहासिक रूप से राजघरानों का संरक्षण प्राप्त रहा है। यह साड़ी अपनी बारीक कारीगरी, रेशम और असली ज़री के उपयोग तथा पारंपरिक डिज़ाइनों के लिए जानी जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पैठणी साड़ी को बनाने में हफ्तों से लेकर महीनों तक का समय लगता है, जिसमें डिज़ाइन कपड़े के साथ ही बुने जाते हैं। इसकी विशिष्टता के कारण इसे ‘क्वीन ऑफ सिल्क्स’ भी कहा जाता है।
इस पहल के तहत येवला के कारीगरों की भूमिका को केंद्र में रखा गया है, जहां पीढ़ियों से जुड़े परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। आयोजन में इन कारीगरों को भी शामिल किया जाएगा, जिससे उनकी कला को व्यापक पहचान मिल सके।

आयोजकों ने बताया कि महाराष्ट्र के बाद ‘कार्या’ की यह यात्रा मध्य प्रदेश में चंदेरी कारीगरी के साथ आगे बढ़ेगी और अंततः मुंबई में आयोजित मुख्य कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कलाएं एक मंच पर प्रस्तुत की जाएंगी।
उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य न केवल कारीगरी को संरक्षित करना है, बल्कि नई पीढ़ी को इससे जोड़ना और कारीगरों को वैश्विक पहचान दिलाना भी है।
