महाराजगंज मॉडल के सहारे सपा को घेरने की तैयारी, पंकज चौधरी निभा सकते हैं यूपी की राजनीति में ‘चाणक्य’ की भूमिका

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा ने संगठन की कमान ऐसे नेता को सौंपी है, जो चुनावी रणनीति और सियासी गणित के लिए जाने जाते हैं। पार्टी अब महाराजगंज मॉडल को प्रदेश स्तर पर लागू कर समाजवादी पार्टी को सीधी चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि, पंकज चौधरी के सामने यह बड़ी जिम्मेदारी होगी कि वे महाराजगंज की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे प्रदेश में खुद को ‘चाणक्य’ सरीखा रणनीतिकार साबित करें।

पंकज चौधरी का राजनीतिक कद इस बात से आंका जा सकता है कि उन्होंने लोकसभा चुनावों में हरिशंकर तिवारी, वीरेंद्र शाही, अखिलेश सिंह और हर्षवर्धन जैसे पूर्वांचल के दिग्गज नेताओं को पराजित किया है। जिन नामों के सामने चुनाव लड़ने से बड़े-बड़े नेता हिचकते रहे, उन्हें पंकज चौधरी ने रणनीति और सामाजिक संतुलन के दम पर मात दी।

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जिला पंचायत चुनावों में उनकी सियासी पकड़ सबसे ज्यादा चर्चा में रही है। प्रदेश में सत्ता चाहे बसपा की रही हो, सपा की या भाजपा की, लेकिन उनके गृह जनपद महाराजगंज में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर भाजपा का कब्जा लगातार बना रहा। जिला पंचायत के गठन के बाद पहली बार उनके भाई प्रदीप चौधरी अध्यक्ष बने, इसके बाद दो बार उनकी मां उज्जवला चौधरी ने जीत दर्ज की।

वर्ष 2010 में, जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद का आरक्षण बदला और प्रदेश में बसपा की सरकार थी, तब भी पंकज चौधरी की राजनीतिक रणनीति ने भाजपा को जीत दिलाई। धर्मा देवी को अध्यक्ष बनाकर उन्होंने यह साबित किया कि सत्ता परिवर्तन से राजनीतिक समीकरण जरूरी नहीं बदलते।

इसके बाद 2015 में, सपा सरकार के दौरान, पंकज चौधरी ने जोड़-तोड़ की सटीक रणनीति से प्रभुदयाल चौहान को जितवाकर पूरे प्रदेश में भाजपा की इकलौती जिला पंचायत अध्यक्ष सीट अपने खाते में डाली। यहीं से राजनीतिक गलियारों में उनकी ‘चाणक्य नीति’ की चर्चा तेज हुई।

वर्ष 2020 में भाजपा के रविकांत पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष बने और तब से यह सीट पूरी तरह भाजपा के कब्जे में बनी हुई है। यही सिलसिला महाराजगंज को भाजपा के लिए एक मॉडल के रूप में स्थापित करता है, जिसे अब प्रदेश स्तर पर उतारने की तैयारी है।

विधानसभा चुनावों में भी पंकज चौधरी का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। वर्ष 2017 में उनके प्रभाव क्षेत्र की पांच में से चार सीटों—पनियरा, सदर, फरेंदा और सिसवा—पर भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि नौतनवा सीट पर निर्दल अमनमणि त्रिपाठी विजयी हुए। वर्ष 2022 में भी भाजपा ने पांच में से चार सीटें जीतीं, हालांकि फरेंदा सीट पर हार का सामना करना पड़ा, लेकिन पहली बार भाजपा गठबंधन ने नौतनवा सीट पर जीत हासिल की।

राजनीतिक आंकड़ों और सामाजिक संतुलन की बारीक समझ रखने वाले पंकज चौधरी को संगठन की जिम्मेदारी सौंपकर भाजपा ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि 2027 की लड़ाई में सपा को उसी रणनीति से घेरा जाएगा, जिसने महाराजगंज में विपक्ष को हाशिये पर पहुंचा दिया। पिछड़े वर्ग के मजबूत वोट बैंक, स्थानीय नेतृत्व और सटीक चुनावी गणित के सहारे भाजपा प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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