अंधविश्वास की दीवार तोड़कर अंगदान को जनआंदोलन बनाने की जरूरत

भारत में हर साल हजारों लोग किसी न किसी अंग के प्रत्यारोपण का इंतजार करते हैं। दूसरी ओर, ऐसे भी अनगिनत अंग हैं, जिन्हें मृत्यु के बाद दान कर किसी जरूरतमंद को नया जीवन दिया जा सकता है। इसके बावजूद अंगदान को लेकर समाज में आज भी कई तरह की भ्रांतियां, डर और अंधविश्वास मौजूद हैं। मध्य प्रदेश की स्थिति इस मामले में विशेष चिंता का विषय है।

मध्य प्रदेश की आबादी आठ करोड़ से अधिक है, लेकिन अंगदान के मामले में राज्य की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर बनी हुई है। वर्ष 2023 में देश में कुल 16,542 अंग प्रत्यारोपण हुए, जिनमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 1.6 प्रतिशत रही। इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति कैडेवरिक यानी मृत व्यक्ति के अंगदान की है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्य प्रदेश में महज 25 कैडेवरिक अंगदान दर्ज किए गए, जबकि इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 कैडेवरिक अंगदान हुए।

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ये आंकड़े बताते हैं कि चुनौती केवल अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं तक सीमित नहीं है। इसके पीछे हमारी सामाजिक सोच और अंगदान को लेकर मौजूद धारणाएं भी बड़ी भूमिका निभाती हैं।

पितृ, मोक्ष और अगले जन्म से जुड़े डर

अंगदान के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक मृत्यु के बाद की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा डर है। कुछ परिवारों को आशंका होती है कि शरीर के अंग दान करने से मृतक की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी, पितृ दोष लगेगा या अगले जन्म में शरीर अधूरा मिलेगा। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि अंतिम संस्कार के लिए शरीर का पूर्ण होना आवश्यक है।

वैज्ञानिक दृष्टि से इन धारणाओं का कोई आधार नहीं है, लेकिन पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताएं आज भी लोगों के निर्णयों को प्रभावित करती हैं। इसलिए अंगदान के प्रति जागरूकता फैलाने की शुरुआत केवल चिकित्सा तथ्यों से नहीं, बल्कि समाज में मौजूद इन आशंकाओं को समझने और दूर करने से करनी होगी।

अंगदान शरीर का अपमान नहीं, जीवन देने का माध्यम है

हमें यह समझना होगा कि अंगदान मृत शरीर का अपमान नहीं, बल्कि किसी दूसरे इंसान को जीवन देने का माध्यम है। हिंदू दर्शन में आत्मा को शरीर से अलग और अमर माना गया है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भी शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता का संदेश मिलता है। ऐसे में यह धारणा कि मृत्यु के बाद किसी अंग के दान से आत्मा को नुकसान होगा, धार्मिक दर्शन की मूल भावना से मेल नहीं खाती।

हमारी संस्कृति में त्याग और परोपकार के अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऋषि दधीचि द्वारा अपनी अस्थियों का दान और राजा शिवि की कथा दूसरों के कल्याण के लिए अपने सर्वस्व का त्याग करने की भावना को दर्शाती है। इन कथाओं का मूल संदेश यही है कि किसी दूसरे के जीवन और कल्याण के लिए किया गया त्याग महान कार्य है।

अलग-अलग धर्मों में भी सेवा, करुणा, दया और मानव जीवन की रक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए अंगदान को किसी धर्म के खिलाफ खड़ा करना न तो तार्किक है और न ही उचित।

जानकारी का अभाव भी बड़ी बाधा

अंधविश्वास के साथ-साथ जानकारी का अभाव भी अंगदान के रास्ते में बड़ी चुनौती है। आज भी बड़ी संख्या में लोग ब्रेन डेथ और कोमा के बीच का अंतर नहीं जानते। कई परिवारों को यह डर रहता है कि अंगदान की प्रक्रिया में उनके प्रियजन के शरीर के साथ अनादर किया जाएगा।

जबकि अंगदान एक निर्धारित चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रिया के तहत किया जाता है। ऐसे समय में परिवार को सही जानकारी, पर्याप्त समय और संवेदनशील सलाह मिलना बेहद जरूरी है।

धर्मगुरु बन सकते हैं बदलाव के वाहक

इस सामाजिक सोच को बदलने में धर्मगुरुओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च केवल धार्मिक शिक्षा के केंद्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक जागरूकता फैलाने के प्रभावी माध्यम भी हैं।

यदि धर्मगुरु सार्वजनिक रूप से यह संदेश दें कि किसी जरूरतमंद की जान बचाना पुण्य, सेवा और मानवता का कार्य है, तो इसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। अंगदान को धार्मिक मान्यताओं के विरोध में देखने के बजाय इसे मानव सेवा के रूप में समझाने की जरूरत है।

सरकार को जिला स्तर पर चलाना होगा अभियान

सरकार को प्रत्येक जिले में अंगदान को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। बड़े अस्पतालों में प्रशिक्षित अंगदान समन्वयक नियुक्त किए जाने चाहिए, जो ब्रेन डेथ के मामलों में परिवार से पूरी संवेदनशीलता और सम्मान के साथ संवाद कर सकें।

स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से भी लोगों को अंगदान की वास्तविक प्रक्रिया और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी जानी चाहिए। अंगदान करने वाले परिवारों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करके समाज के सामने सकारात्मक उदाहरण भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

एक व्यक्ति के अंग कई जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन दे सकते हैं। इसलिए मृत्यु को केवल जीवन का अंत मानने के बजाय इसे किसी और के जीवन को बचाने का अंतिम अवसर भी समझने की जरूरत है।

मध्य प्रदेश को सामूहिक प्रयास की जरूरत

मध्य प्रदेश को अंगदान के क्षेत्र में आगे ले जाने के लिए केवल सरकारी आदेश पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए सरकार, चिकित्सा जगत, धर्मगुरुओं, मीडिया, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर लगातार अभियान चलाना होगा।

सबसे जरूरी है कि हम डर और अंधविश्वास के बजाय तथ्य, संवेदना और मानवता के आधार पर निर्णय लें।

पितृ और मोक्ष की चिंता अपनी जगह है, लेकिन किसी जीवित इंसान की जान बचाना भी तो धर्म और मानवता का ही काम है। अब समय आ गया है कि अंगदान को केवल चिकित्सा से जुड़ा विषय न मानकर एक सामाजिक जनआंदोलन बनाया जाए।

आखिर मृत्यु के बाद भी किसी को जीवन देने से बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है?

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