कांग्रेस से कमंडल तक: कैसे बदलती रही उत्तर प्रदेश की सियासत

भारतीय राजनीति में लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा राज्य है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी सबसे प्रभावशाली माना जाता है। आजादी के बाद देश को मिले अधिकांश प्रधानमंत्रियों का इस राज्य से सीधा संबंध रहा है। लगभग 24 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य की राजनीति ने कांग्रेस के प्रभुत्व से लेकर मंडल-कमंडल की राजनीति, क्षेत्रीय दलों के उदय और भाजपा के वर्तमान वर्चस्व तक कई बड़े बदलाव देखे हैं।

आजादी के बाद कई दशकों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही। गोविंद बल्लभ पंत राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। उनके बाद चंद्रभानु गुप्ता, सुचेता कृपलानी और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेताओं ने प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस का आखिरी स्वर्णिम दौर साबित हुआ, जब नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। लेकिन इसके बाद पिछड़े वर्गों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ने लगी और कांग्रेस का मजबूत जनाधार धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।

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1989 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया। पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण मिलने से सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा मिली। इसी दौर में मुलायम सिंह यादव ने जनता दल के नेतृत्व में अपनी पहली सरकार बनाई और बाद में समाजवादी पार्टी की स्थापना की। दूसरी ओर, कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी दलित राजनीति की मजबूत ताकत बनकर उभरी। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से दूर रखते हुए नई राजनीतिक धारा की शुरुआत की।

इसी समय भाजपा ने राम मंदिर आंदोलन के जरिए हिंदुत्व की राजनीति को नई मजबूती दी। कल्याण सिंह भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरे बनकर उभरे और 1991 में उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा की पहली सरकार बनी। बाबरी विध्वंस के समय भी कल्याण सिंह ही मुख्यमंत्री थे। उनके नेतृत्व ने भाजपा को पिछड़े वर्गों में मजबूत आधार दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई।

1990 और 2000 का दशक उत्तर प्रदेश में त्रिकोणीय राजनीति का दौर रहा, जहां सपा, बसपा और भाजपा के बीच सत्ता का संघर्ष लगातार चलता रहा। मुलायम सिंह यादव ने यादव-मुस्लिम समीकरण के दम पर अपनी पकड़ मजबूत की, जबकि मायावती ने दलित राजनीति को नई ऊंचाई दी। 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग के जरिए पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रच दिया। उनके शासनकाल को कानून-व्यवस्था, पार्कों और स्मारकों के निर्माण तथा दलित गौरव की राजनीति के लिए याद किया जाता है।

2012 में समाजवादी पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और अखिलेश यादव राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने विकास और आधुनिक छवि पर जोर दिया, लेकिन परिवार के भीतर बढ़ी राजनीतिक खींचतान ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। 2017 में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और हिंदुत्व की लहर के बीच भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने।

योगी सरकार ने कानून-व्यवस्था, बुलडोजर कार्रवाई और अपराध नियंत्रण को अपनी पहचान बनाया। 2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचा। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी और मुकाबले को फिर से रोचक बना दिया।

वर्तमान में उत्तर प्रदेश की राजनीति जातीय और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रही है। भाजपा गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को साधने की कोशिश कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी पीडीए रणनीति के जरिए अपना जनाधार मजबूत करने में जुटी है। निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और सुभासपा जैसे छोटे दल भी अपनी जातीय पकड़ के कारण अहम भूमिका निभा रहे हैं।

अब सभी की नजरें 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। यह चुनाव तय करेगा कि योगी आदित्यनाथ का प्रभाव बरकरार रहेगा या अखिलेश यादव का नया सामाजिक समीकरण सत्ता परिवर्तन का रास्ता खोलेगा। इतना जरूर है कि देश की राजनीति को समझने के लिए उत्तर प्रदेश की सियासत को समझना आज भी सबसे ज्यादा जरूरी माना जाता है।

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