सोनी सब के कलाकारों ने होली की उमंग को यादों, रंगों और खुशियों के साथ मनाया

मुंबई, फरवरी 2026: होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि खुशियों, अपनापन और साथ बिताए पलों का उत्सव है। यह वह दिन होता है जब बचपन की शरारतें लौट आती हैं, रिश्तों की दूरी मिट जाती है और ठहाकों, संगीत व पकवानों से माहौल सराबोर हो जाता है। इस होली पर सोनी सब के लोकप्रिय कलाकार करुणा पांडे, ऋषि सक्सेना, दीक्षा जोशी और श्रेनु पारिख ने साझा कीं अपनी दिल से जुड़ी यादें और वे परंपराएँ, जो हर साल इस त्योहार को उनके लिए खास बनाती हैं।

करुणा पांडे: बचपन की बेफिक्र मस्ती

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‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में पुष्पा का किरदार निभा रहीं करुणा पांडे बताती हैं,

“मेरी सबसे मज़ेदार होली की याद स्कूल के दिनों की है, जब मेरे पिता शिलॉन्ग में पोस्टेड थे। माँ ने हमें सिर्फ एक-दो घंटे खेलने की अनुमति दी थी, लेकिन हम सुबह से शाम तक रंगों में डूबे रहे। जब माता-पिता हमें ढूंढने आए, तो पहचान ही नहीं पाए कि उनका बच्चा कौन है। हम काले और हरे रंग में लिपटे छोटे-छोटे भूत जैसे लग रहे थे। आज भी वह याद मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। वही बेफिक्र खुशी मेरे लिए होली का असली मतलब है।”

ऋषि सक्सेना: शरारतों और गुजियों की खुशबू

‘इत्ती सी खुशी’ में संजय का किरदार निभा रहे ऋषि सक्सेना कहते हैं,

“बचपन में होली वह दिन होता था, जब शरारत करने की पूरी छूट मिलती थी और डांट भी नहीं पड़ती थी। हम पहले से तय करते थे कि किस दोस्त को रंगों से सरप्राइज देना है। दिन के अंत तक कोई पहचान में नहीं आता था और असली परेशानी घर पर शुरू होती थी, जब रंग कई दिनों तक नहीं उतरते थे। मुझे लगता है कि मैंने रंग खेलने से ज्यादा समय उन्हें छुड़ाने में बिताया है। और फिर घर लौटकर ताज़ा गुजियों की खुशबू—उत्तर भारत में होली इनके बिना अधूरी लगती है। यह त्योहार मुझे फिर से बच्चा बना देता है।”

दीक्षा जोशी: मस्ती के साथ गरिमा

‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ में दीप्ति की भूमिका निभा रहीं दीक्षा जोशी साझा करती हैं,

“पिछले कुछ वर्षों से मैं मुंबई में होली मना रही हूं। हम अक्सर माध आइलैंड या रहेजा टाउनशिप में दोस्तों के साथ इकट्ठा होते हैं, जहां रंग, संगीत और हंसी का माहौल होता है। लेकिन मुझे घर की बनी गुजिया और पुए की बहुत याद आती है, खासकर पहाड़ी परिवारों के त्योहारों वाले पकवान। उन स्वादों में घर की गर्माहट होती है। मैं रंगों से खेलना पसंद करती हूं, लेकिन हर्बल रंगों के साथ और त्योहार की गरिमा बनाए रखते हुए। मेरे लिए होली मस्ती और संतुलन दोनों का नाम है।”

श्रेनु पारिख: घर, संगीत और रंगों की पहचान

‘गणेश कार्तिकेय’ में पार्वती का किरदार निभा रहीं श्रेनु पारिख कहती हैं,

“मेरे लिए होली हमेशा घर और बैकग्राउंड में बजते संगीत से जुड़ी रही है। वडोदरा में होली सिर्फ रंग लगाने तक सीमित नहीं थी। हम हफ्तों पहले तैयारी करते थे—क्या पहनना है, यह जानते हुए कि एक घंटे में सब खराब हो जाएगा। दोपहर तक कोई पहचान में नहीं आता था, फिर मिठाइयाँ बांटना और हंसी-मजाक चलता रहता था। बालों में कई दिनों तक जमे रंग और गालों पर अटकी गुलाबी परत जैसे गर्व का निशान लगते थे। आज भी होली मुझे वही शुद्ध और बेफिक्र खुशी याद दिलाती है।”

देखते रहिए ‘इत्ती सी खुशी’, ‘गणेश कार्तिकेय’ और ‘पुष्पा इम्पॉसिबल’ — केवल सोनी सब पर।

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