- Hindi News
- Top News
- मंडल बनाम कमंडल : तीन दशकों में बदला भारतीय राजनीति का चेहरा
मंडल बनाम कमंडल : तीन दशकों में बदला भारतीय राजनीति का चेहरा
भारतीय राजनीति के इतिहास में 1990 का दशक एक ऐसे दौर के रूप में दर्ज है, जिसने देश की सामाजिक और राजनीतिक दिशा को गहराई से प्रभावित किया। इसी कालखंड में ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ की राजनीति सामने आई, जिसने भारतीय लोकतंत्र और सत्ता समीकरणों को नई परिभाषा दी।
इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन को प्रमुखता देते हुए ‘कमंडल’ राजनीति को धार दी। की 1990 में निकली सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा भारतीय राजनीति का बड़ा मोड़ साबित हुई। बिहार के समस्तीपुर में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद मंडल और कमंडल की राजनीति का सीधा टकराव सामने आया और अंततः वी.पी. सिंह सरकार गिर गई।
इसके बाद उत्तर भारत की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। , , और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं ने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीति को मजबूत आधार दिया।
वर्ष 1992 में मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को संवैधानिक वैधता प्रदान की, हालांकि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा और क्रीमी लेयर जैसी शर्तें भी जोड़ी गईं।
वर्तमान दौर में भारतीय राजनीति में मंडल और कमंडल के बीच संतुलन बनाने की कोशिश दिखाई देती है। केंद्र सरकार सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दोनों को साथ लेकर चलने की रणनीति अपनाती नजर आती है। वहीं विपक्ष जातीय जनगणना और सामाजिक हिस्सेदारी जैसे मुद्दों के जरिए मंडल राजनीति को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
भारतीय लोकतंत्र के इस लंबे राजनीतिक सफर ने यह स्पष्ट किया है कि देश में सामाजिक न्याय, पहचान और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे साथ-साथ चलते रहेंगे और यही इसकी लोकतांत्रिक जीवंतता की सबसे बड़ी पहचान है।
