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यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कहा—क्या हम जातिविहीन समाज से पीछे जा रहे हैं
नई दिल्ली। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों के क्रियान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। ये नियम 23 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता बढ़ाने के उद्देश्य से जारी किए गए थे।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा,
“क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं? हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए। जिन्हें सुरक्षा की आवश्यकता है, उनके लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए।”
पीठ ने कहा कि इन नियमों के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत में शिक्षण संस्थानों को एकता का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, न कि छात्रों को जाति के आधार पर विभाजित करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि देश को ऐसी स्थिति में नहीं जाना चाहिए, जहां अलग-अलग वर्गों के लिए अलग संस्थान बनाए जाएं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा,
“अलग छात्रावास बनाने की बात बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। जातिविहीन समाज की दिशा में जो उपलब्धियां हमने हासिल की हैं, क्या हम अब उनसे पीछे जा रहे हैं?”
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि आरक्षित वर्ग से जुड़ा कोई छात्र किसी अन्य वर्ग के छात्र के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करता है, तो क्या मौजूदा नियमों में उसके लिए कोई समाधान है। न्यायालय ने यह संकेत दिया कि नियम कहीं एकतरफा संरक्षण तो नहीं दे रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अब यह स्पष्ट हो चुका है कि आरक्षित वर्गों के भीतर भी कुछ समुदाय अपेक्षाकृत सक्षम हो चुके हैं, जबकि कुछ अब भी वंचित हैं। ऐसे में नीति निर्धारकों को संतुलन बनाकर निर्णय लेना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले पर 19 मार्च को आगे सुनवाई होगी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये नियम योग्यता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत हैं। उनका दावा है कि समानता के नाम पर सामान्य वर्ग के छात्रों के अवसर सीमित किए जा रहे हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन पैदा हो सकता है।
