राजनीति के उपभोक्ता नहीं, निर्माता बनें भारतीय युवा — डॉ. अतुल मलिकराम

वर्ष 2026 के वैश्विक परिदृश्य में, जब दुनिया अमेरिका–चीन के बीच शक्ति संघर्ष, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल प्रभुत्व और सामाजिक असंतोष जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे समय में भारतीय युवा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आज का युवा पश्चिमी तकनीक, नवाचार और आर्थिक अवसरों से प्रेरित है, लेकिन उसकी चेतना भारतीय संस्कृति, सामूहिक सोच और सतत विकास की जड़ों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। यही द्वंद्व उसे विशिष्ट बनाता है।

यह दौर केवल मतदान करने या राजनीतिक बहसों का दर्शक बनने का नहीं है, बल्कि राजनीति की दिशा तय करने में सक्रिय भूमिका निभाने का है। अब समय आ गया है कि युवा राजनीति का मात्र उपभोक्ता बनकर न रहे, बल्कि उसका निर्माता बने।

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भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह वर्ग केवल मतदाता नहीं, बल्कि नीति-निर्माण, नेतृत्व और भविष्य गढ़ने की वास्तविक क्षमता रखता है। इसके बावजूद राजनीति में युवाओं की भागीदारी आज भी मुख्य रूप से मतदान तक सीमित है। भले ही हाल के वर्षों में युवा मतदान प्रतिशत बढ़ा हो, लेकिन संसद, विधानसभा और नीति-निर्माण संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व अब भी बेहद कम है। उदाहरण के तौर पर 18वीं लोकसभा में 25 से 35 वर्ष आयु वर्ग के सांसदों की संख्या कुल का मात्र 8 से 10 प्रतिशत ही है।

युवाओं की राजनीति से दूरी के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। राजनीतिक दलों में वरिष्ठ नेतृत्व का वर्चस्व, निर्णयकारी भूमिकाओं में युवाओं की सीमित भागीदारी, टिकट वितरण में अवसरों की कमी, परिवारवाद और वंशानुगत राजनीति जैसी प्रवृत्तियां बड़ी बाधा हैं। इसके साथ ही शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक चेतना, नेतृत्व क्षमता और नीति-निर्माण की समझ विकसित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। आर्थिक असुरक्षा और करियर की चिंता भी युवाओं को सक्रिय राजनीति से दूर रखती है।

स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को आत्मविश्वास, आत्मशक्ति और कर्मयोग—ये तीन मूल मंत्र दिए थे। आत्मविश्वास युवाओं को व्यवस्था बदलने का साहस देता है, आत्मशक्ति उन्हें सतत संघर्ष के लिए प्रेरित करती है और कर्मयोग यह सिखाता है कि राजनीति को सत्ता की दौड़ नहीं, बल्कि सेवा और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया जाए।

आज की प्रमुख राजनीतिक चुनौतियाँ—बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, पर्यावरण संकट, डिजिटल असमानता और सामाजिक न्याय—सीधे तौर पर युवाओं से जुड़ी हैं। इन समस्याओं का सबसे प्रभावी, व्यावहारिक और दीर्घकालिक समाधान युवा नेतृत्व ही दे सकता है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया, यूट्यूब और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म युवाओं के हाथ में ऐसे शक्तिशाली उपकरण हैं, जिनसे वे जनमत तैयार कर सकते हैं, संवाद स्थापित कर सकते हैं और नए राजनीतिक विमर्श खड़े कर सकते हैं।

राजनीति में प्रवेश के लिए युवाओं को जमीनी स्तर से शुरुआत करनी चाहिए। पंचायत, नगर निकाय और स्थानीय संगठनों से अनुभव प्राप्त कर आगे बढ़ना अधिक टिकाऊ और प्रभावी मार्ग साबित होता है। वहीं, राजनीतिक दलों को भी युवाओं के लिए ठोस नीतियाँ बनानी होंगी—जैसे टिकट वितरण में युवा प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, नेतृत्व प्रशिक्षण अकादमियों की स्थापना और आर्थिक सहयोग की व्यवस्था। युवा विंग को केवल औपचारिक इकाई न बनाकर उसे वास्तविक निर्णय-निर्माण की शक्ति देनी होगी।

भारत का भविष्य युवाओं के हाथों में है। यदि युवा राजनीति को केवल देखने, टिप्पणी करने और आलोचना तक सीमित रखेंगे, तो बदलाव अधूरा रह जाएगा। युवा केवल भविष्य नहीं हैं, वे वर्तमान की सबसे बड़ी ताकत हैं। यही वह समय है जब उन्हें राजनीति के उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता के रूप में आगे आना होगा।

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