हेट स्पीच के खिलाफ

देश में राजनीतिक सुचिता दिन-ब-दिन गिरती जा रही है। राजनीति में अभद्र भाषा का प्रचलन बढ़ गया है। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि हेट स्पीच अर्थात् अभद्र भाषा का प्रयोग जनता के बीच लोकप्रियता पाने के लिए किया जा रहा है। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय भी इस पर सख्त टिप्पणी कर चुका है।

उसके बाद भी हेट स्पीच के मामलों में कमी नहीं आई। इसके लिए किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों तरफ के नेताओं द्वारा नफरती बयान दिए जाते रहते हैं। बुधवार को एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती बयानों के खिलाफ सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने चार राज्यों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उन्होंने अपने यहां इस संबंध में नोडल अधिकारी की नियुक्ति की है या नहीं।

गौरतलब है कि चार महीने पहले अगस्त में नफरती बयानों पर रोक लगाने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी कि इस तरह के बयान देने वाले चाहे जो हों,उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसके लिए अदालत ने राज्य सरकारों को अपने यहां नोडल अधिकारी नियुक्त करने का आदेश दिया था,जो नफरती भाषणों का संज्ञान लेकर मामले दर्ज और उन पर कार्रवाई करेंगे।

इस संबंध में केंद्र सरकार की तरफ से बताया गया कि अट्ठाइस राज्यों ने नोडल अधिकारी की नियुक्ति कर दी है,लेकिन पांच राज्यों- पश्चिम बंगाल,केरल,गुजरात, तमिलनाडु और नागालैंड ने इस संबंध में कोई जानकारी नहीं उपलब्ध कराई है। यद्यपि पश्चिम बंगाल का कहना है कि उसने भी अपने यहां नोडल अधिकारी की नियुक्ति कर दी है।

दरअसल सर्वोच्च न्यायालय कई बार केंद्र और राज्य सरकारों को नफरती भाषणों पर रोक लगाने के लिए कठोर कदम उठाने का निर्देश दे चुका था,मगर जब उसके सकारात्मक नतीजे नहीं आए तब उसने दिशा-निर्देश जारी कर राज्य सरकारों की जवाबदेही तय की थी। उसी के तहत नोडल अधिकारी की नियुक्ति की जानी थी।

यह बात न केवल समझ से परे है,बल्कि सरकारों की उदासीनता को भी दर्शाती है कि समाज में वैमनस्यता पैदा करने वाले नफरती बयानों जैसे मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती के बावजूद चार महीने बाद भी चार राज्यों ने इस मामले पर गंभीरता नहीं दिखाई। इस बात से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता कि हेट स्पीच से समाज में अलगाव व कटुता की भावना को प्रबलता मिलती है।

राज्यों को इस संबंध में गंभीरता दिखाते हुए कठोर रवैया अपनाना पड़ेगा। साथ ही शासन व प्रशासन द्वारा ऐसे मामलों में पक्ष-विपक्ष को न देखते हुए बिना किसी भेदभाव के त्वरित कानूनी कार्रवाई करनी होगी, तभी देश में हेट स्पीच पर रोक लगाई जा सकेगी।

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