लखनऊ : महिला आरक्षण बिल पर सपा का रुख बना सियासी बहस का केंद्र, अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती

UP News: महिला आरक्षण विधेयक एक बार फिर भारतीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया है। लोकसभा में दो दिनों की बहस के बाद महिला आरक्षण बिल पर समाजवादी पार्टी (सपा) के रुख ने नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। कभी मुलायम सिंह यादव ने जिस मुखरता से इस बिल का विरोध किया था, अब सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी उसी राह पर चलते नजर आ रहे हैं।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए यह मुद्दा उनके नए राजनीतिक फॉर्मूले ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। सदन में चर्चा के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने बिल के विरोध में मतदान किया।

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अखिलेश यादव का तर्क है कि आरक्षण का लाभ देश की पिछड़ी, दलित और मुस्लिम महिलाओं तक समान रूप से पहुंचना चाहिए। उनका कहना है कि ‘कोटा के भीतर कोटा’ सुनिश्चित किए बिना यह बिल अधूरा रहेगा और इसका वास्तविक लाभ समाज के अंतिम वर्ग तक नहीं पहुंचेगा।

महिला आरक्षण बिल का विरोध समाजवादी पार्टी के लिए नया नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने भी हमेशा यह कहते हुए इसका विरोध किया था कि इसमें ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान नहीं है।

साल 2010 में भी उनके विरोध के चलते सपा पर महिला विरोधी होने के आरोप लगे थे। अब अखिलेश यादव भी सरकार से जातिगत जनगणना कराने और जनसंख्या के सही आंकड़ों के आधार पर आरक्षण तय करने की मांग दोहरा रहे हैं।

सपा द्वारा बिल के विरोध में मतदान के बाद भाजपा को बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा अब इस मुद्दे को लेकर अखिलेश यादव को महिला विरोधी साबित करने की कोशिश करेगी।

उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं का झुकाव पिछले कुछ चुनावों में भाजपा की ओर देखा गया है। ऐसे में सपा का यह रुख आगामी विधानसभा चुनावों में उसके लिए चुनौती बन सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अखिलेश यादव के विरोध के पीछे परिसीमन की आशंका भी एक बड़ा कारण है। बिल लागू होने के बाद यदि परिसीमन होता है और उत्तर प्रदेश में सीटों की संख्या बदलती है, तो राज्य की राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है।

सपा को आशंका है कि इससे भाजपा को रणनीतिक और राजनीतिक बढ़त मिल सकती है। ऐसे में सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सपा के लिए आसान नहीं दिख रहा है।

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