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Lucknow Fire Tragedy: 45 मिनट की देरी पर उठे सवाल, पुलिस ने तोड़ी दीवारें, रेस्क्यू में बचाईं कई जिंदगियां
लखनऊ। अलीगंज सेक्टर-डी स्थित एनीमेशन सेंटर में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड के बाद राहत एवं बचाव कार्यों को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग लगने की सूचना मिलने के बावजूद अग्निशमन विभाग की टीम करीब 45 मिनट बाद मौके पर पहुंची। लोगों का कहना है कि यदि दमकल की गाड़ियां समय पर पहुंच जातीं, तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
एक ही रास्ता बना मौत का जाल
पुलिस ने संभाला मोर्चा
हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस कमिश्नर अमरेंद्र कुमार सेंगर, संयुक्त पुलिस आयुक्त अपराध अपर्णा कुमार, संयुक्त पुलिस आयुक्त कानून-व्यवस्था बबलू कुमार, डीसीपी उत्तरी गोपाल कृष्ण चौधरी और एडीसीपी ट्विंकल जैन सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंच गए। इसके अलावा डीजीपी राजीव कृष्ण, अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद और डीजी अग्निशमन सेवा सुजीत पांडेय ने भी घटनास्थल का निरीक्षण कर राहत कार्यों की निगरानी की।
इंस्पेक्टर और सिपाहियों ने हथौड़े से तोड़ी दीवार
रेस्क्यू अभियान के दौरान पुलिस की तत्परता देखने को मिली। मड़ियांव थाना प्रभारी शिवानंद मिश्रा दो सिपाहियों के साथ पास की इमारत की छत पर पहुंचे और हथौड़ों से एनीमेशन सेंटर की दीवार तोड़नी शुरू कर दी। करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद अंदर पहुंचने का रास्ता बनाया गया। बाद में दमकल कर्मियों ने कटर मशीन की मदद से दीवार को और चौड़ा कर बचाव कार्य तेज किया। इस प्रयास से करीब 10 लोगों को सुरक्षित निकालकर ट्रॉमा सेंटर भेजा गया।
एसी विस्फोट के बाद फैला धुआं
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार भवन की दूसरी मंजिल पर संचालित एनीमेशन एवं गेमिंग सेंटर में दोपहर करीब दो बजे एसी के कंप्रेसर में विस्फोट होने के बाद आग लगी। देखते ही देखते पूरे भवन में धुआं भर गया। धुएं के कारण छात्रों में अफरा-तफरी मच गई। कई छात्र जान बचाने के लिए बाथरूम में छिप गए, लेकिन धुएं के कारण उनका दम घुट गया।
कई विभागों की लापरवाही आई सामने
जांच में सामने आया है कि जिस भवन में हादसा हुआ, उसका केवल भूतल आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत था, जबकि वहां चार मंजिला व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही थीं। भवन के पास न तो फायर एनओसी थी और न ही बिल्डिंग सेफ्टी सर्टिफिकेट। इसके बावजूद यहां गेमिंग जोन, कोचिंग और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही थीं।
जानकारी के मुताबिक, भवन के लिए 20 किलोवाट विद्युत लोड स्वीकृत था, जबकि वास्तविक खपत 35.50 किलोवाट तक पहुंच चुकी थी। फरवरी 2025 में संबंधित संस्थानों को नोटिस जारी किए जाने और लाइसेंस निरस्तीकरण की सिफारिश के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में जिला प्रशासन, एलडीए, नगर निगम, बिजली विभाग और फायर विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
बढ़ सकती है जिम्मेदारों पर कार्रवाई
हादसे के बाद शासन स्तर पर विस्तृत जांच के आदेश दिए गए हैं। अधिकारियों का कहना है कि भवन निर्माण, सुरक्षा मानकों और संचालन से जुड़ी सभी अनियमितताओं की जांच कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
