Good news: SGPGI की नस में सुई डालने की विशिष्ट विधि को मिला पेटेंट, गंभीर बीमारी से परेशान मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत 

लखनऊ। गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीजों को दवा चढ़ाने या पोषण देने के लिए नस में बार-बार सुई डालने निजात मिलेगी। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (पीजीआई) में क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने सुई डालने की तकनीक का अविष्कार वर्ष 2013 में किया था, अब इसे पेटेंट मिल गया है। भारतीय पेटेंट कार्यालय में वर्ष 2016 में आवेदन किया गया था। संस्थान के निदेशक प्रो. आरके धीमन ने पूरी टीम को बधाई दी।

पीजीआई के डॉ. तन्मय घटक, विभागाध्यक्ष प्रो. आरके सिंह और पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एके बैरोनिया ने ये अविष्कार किया है। डॉ. तन्मय ने बताया कि क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में भर्ती गंभीर मरीजों को दवा से लेकर खाना तक कैथेटर के माध्यम से देना पड़ता है। इसके लिए गले के पास या फिर पैर की मोटी नस में कैथेटर डाला जाता है। गले के पास सुई या सेंट्रल वेनस कैन्युलेशन (सीवीसी) डालना काफी खतरे वाला होता है। इससे अंग क्षतिग्रस्त होने की आशंका बनी रहती है। इसको देखते हुए अल्ट्रासाउंड आधारित सुई डालने की तकनीक उपयोग में लाई गई। इसमें अड़चन थी कि सुई की नोक नजर नहीं आती थी। लिहाजा नस की दीवार क्षतिग्रस्त होने का खतरा बना रहता है। इस खतरे से निपटने के लिए सुई पर माप अंकित करने का प्रयोग किया गया। सुई पर हर आधे सेंटीमीटर पर निशान लगाए गए। अल्ट्रासाउंड के माध्यम से गहराई मापी गई। ऐसे में सुई डालने वाले को यह पता रहता है कि सुई कितनी भीतर तक धंसानी है।

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