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वो तुम्हारे तोड़ने की जिद थी, ये हमारे जोड़ने की जिद है...
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जोड़ने की जिद
मुझे बार-बार
तोड़ा गया
पत्थर से
फोड़ा गया
और बनाकर मेरे
नन्हें-नन्हें टुकड़े
फेंक दिया गया
दूर-दूर तक, ताकि
धूप में सूख जाऊँ
शीत में गल जाऊँ
धूल में मिल जाऊँ;
हुआ कुछ अलग, कि
मैं मरा नहीं था
पूरा का पूरा
किसी बार,
जी उठा था समेटकर
अपने नन्हें-नन्हें टुकड़े
हर बार
समक्ष अपने देखकर
हैरान न हो दोस्त !
ये समझो,
वो तुम्हारे तोड़ने की
जिद थी
ये हमारे जोड़ने
की जिद है।
विंध्याचल सिंह
बुढ़ऊं, बलिया, उत्तर प्रदेश
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