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वैचारिक संघर्ष से सत्ता के शिखर तक : ऐसा रहा भाजपा के उदय का सफर
भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का उदय किसी सामान्य राजनीतिक यात्रा की कहानी नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष, संगठनात्मक प्रतिबद्धता और दशकों की तपस्या का परिणाम है। आज दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में स्थापित भाजपा की नींव ऐसे दौर में रखी गई थी, जब देश की राजनीति पर कांग्रेस का एकछत्र वर्चस्व था और विपक्ष के लिए राजनीतिक जमीन बेहद सीमित थी।
1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने गौ-रक्षा, हिंदी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर अपनी पहचान मजबूत की। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने “एकात्म मानववाद” का सिद्धांत देकर पार्टी को वैचारिक आधार प्रदान किया। 1967 के बाद जनसंघ ने राज्यों में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज करानी शुरू की, लेकिन निर्णायक मोड़ 1975 की आपातकाल अवधि में आया।
इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान जनसंघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया। 1977 में जनसंघ ने राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हुए जनता पार्टी में विलय किया और पहली बार केंद्र की सत्ता में भागीदारी की। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता सरकार में शामिल हुए। हालांकि, आरएसएस से संबंधों को लेकर उठे विवाद के कारण यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं टिक सका।
6 अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अपनाया, लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को केवल दो सीटों पर सिमटना पड़ा। यह पार्टी के इतिहास का सबसे कठिन दौर था। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की अपनी मूल विचारधारा को और स्पष्ट रूप से सामने रखा।
1990 का दशक भाजपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। 1989 के पालमपुर अधिवेशन में राम मंदिर निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया और आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा ने देश की राजनीति को नई दिशा दी। भाजपा ने तेजी से अपना जनाधार बढ़ाया और 1991 तथा 1996 के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की।
इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने गठबंधन राजनीति का सफल उदाहरण प्रस्तुत किया। 24 दलों के साथ सरकार चलाकर भाजपा ने यह साबित किया कि वह केवल आंदोलनकारी राजनीति ही नहीं, बल्कि स्थिर शासन देने में भी सक्षम है।
2014 के बाद भाजपा का राजनीतिक विस्तार नए शिखर पर पहुंचा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी ने राष्ट्रवाद के साथ विकास और गरीब कल्याण को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया। अनुच्छेद 370 का हटना, राम मंदिर निर्माण, उज्ज्वला योजना, डिजिटल इंडिया और गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं ने भाजपा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंचाया।
जनसंघ से भाजपा तक की यह यात्रा भारतीय राजनीति में वैचारिक दृढ़ता, संगठनात्मक क्षमता और नेतृत्व की निरंतरता का उदाहरण मानी जाती है। 1951 में शुरू हुआ यह आंदोलन आज लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता तक पहुंचकर भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिख चुका है।
