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तकनीक का दुरुपयोग
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का आम जीवन में वैश्विक हस्तक्षेप पिछले दस वर्ष से होता आया है। इन दिनों एआई की चर्चा विभिन्न क्षेत्रों में इसके योगदान से अधिक इसके दुरुपयोग को लेकर हो रही है। हालांकि काफी पहले से ही यह आशंका जताई जा रही थी कि आने वाले समय में एआई के जरिए अपराधी तत्व अपने खतरनाक मंसूबों को क्रियान्वित करने में सफल हो सकते हैं।
केंद्र सरकार ने मामले की गंभीरता को लेकर सख्ती दिखाई है। सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों से शिकायत दर्ज होने के 36 घंटे के भीतर डीपफेक हटाने को कहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने कहा है कि इस तरह के कृत्य के लिए तीन साल की जेल की सजा हो सकती है और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक ऑनलाइन सभी डीपफेक वीडियो में 98 प्रतिशत सामग्री वयस्कों से जुड़ी होती है, जो ज्यादातर महिलाओं को निशाना बनाती है। दरअसल, हाल के दिनों में सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले लोगों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है। लोग सहज भाव से अपनी फोटो व वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते रहते हैं, जो ऐसे खतरों की जद में लगातार बने रहते हैं।
चिंता की बात तो यह है कि भारत दुनिया के असुरक्षित देशों में छठे स्थान पर आता है। हाल ही में विश्व के प्रथम एआई सुरक्षा शिखर सम्मेलन-2023 में अमेरिका, चीन और भारत सहित 28 प्रमुख देशों ने एआई के संभावित जोखिमों को दूर करने के लिए वैश्विक कार्रवाई की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।
बैलेचली पार्क में हुए पहले एआई शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में जानबूझकर किए गए दुरुपयोग और एआई प्रौद्योगिकियों पर नियंत्रण खोने के जोखिमों को स्वीकार किया गया। ध्यान रहे भारत में ऐसे विशिष्ट कानून या नियम नहीं हैं, जो डीपफेक तकनीक के उपयोग पर प्रतिबंध या विनियमन निर्धारित करते हों।
गोपनीयता, सामाजिक स्थिरता, राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतंत्र पर संभावित प्रभाव को देखते हुए भारत को विशेष रूप से डीपफेक को लक्षित करने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा विकसित करने की आवश्यकता है। डीपफेक द्वारा उत्पन्न चुनौतियों व अवसरों का समाधान करने के लिए सरकारों, मीडिया, नागरिक समाज, शिक्षा एवं उद्योग जैसे विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग तथा समन्वय को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
