ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते केवल दो पड़ोसी देशों के संबंध नहीं हैं। यह इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और भूगोल से जुड़ा ऐसा रिश्ता है, जिसका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर पर पड़ता है। पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी और शेख हसीना के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों ने कई महत्वपूर्ण पड़ाव पार किए। लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने इस साझेदारी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

भारत-बांग्लादेश संबंधों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम में पड़ी थी। हालांकि आजादी के बाद अवैध प्रवास, सीमा प्रबंधन, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और उग्रवाद जैसे मुद्दे दोनों देशों के रिश्तों को कई बार प्रभावित करते रहे। 2009 में शेख हसीना के दोबारा सत्ता में आने के बाद स्थिति में बड़ा बदलाव आया। बांग्लादेश ने अपनी जमीन से भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की और सुरक्षा सहयोग का नया दौर शुरू हुआ।

यह भी पढ़े - भोपाल में आरडीबी ग्रुप और प्रिमार्क ग्रुप की नई साझेदारी की शुरुआत, विकास और संवाद पर रहेगा जोर

मोदी सरकार के आने के बाद इस रिश्ते को और गति मिली। 2015 का भूमि सीमा समझौता इसका महत्वपूर्ण उदाहरण था। इसके तहत दोनों देशों ने क्रमशः 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया। दशकों पुरानी इस जटिल समस्या का समाधान केवल सीमा प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि यह दोनों देशों के बीच बढ़ते राजनीतिक विश्वास का भी संकेत था।

कनेक्टिविटी बनी रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत

इसके बाद कनेक्टिविटी भारत-बांग्लादेश संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बन गई। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक का उद्घाटन हुआ। लगभग 12.24 किलोमीटर लंबा यह रेल संपर्क भारत के पूर्वोत्तर को बांग्लादेश के रास्ते क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

यही वह क्षेत्र है जहां बांग्लादेश का महत्व विदेश नीति से आगे बढ़कर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रणनीति से जुड़ता है। पूर्वोत्तर भारत लंबे समय से सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भर रहा है। बांग्लादेश के बंदरगाहों, रेल नेटवर्क और जलमार्गों तक बेहतर पहुंच इस निर्भरता को कम कर सकती है तथा माल ढुलाई के समय और लागत में कमी ला सकती है।

सुरक्षा सहयोग का असर

सुरक्षा के मोर्चे पर भी हसीना सरकार के साथ भारत का सहयोग महत्वपूर्ण रहा। अतीत में पूर्वोत्तर भारत के कई उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया था। ढाका की कार्रवाई और भारत-बांग्लादेश के बढ़ते सुरक्षा सहयोग से इस चुनौती को काफी हद तक कमजोर करने में मदद मिली।

इसलिए भारत के लिए बांग्लादेश केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की सुरक्षा और स्थिरता का महत्वपूर्ण साझेदार भी है।

आर्थिक रिश्ते भी इसी अवधि में मजबूत हुए। भारत ने बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर रियायती ऋण उपलब्ध कराए। बिजली, रेल, सड़क, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं को करीब लाया।

2024 के बाद बदली तस्वीर

अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद दोनों देशों के रिश्तों का राजनीतिक आधार बदल गया। हसीना भारत आ गईं और बांग्लादेश में अंतरिम सरकार का दौर शुरू हुआ। इसके बाद फरवरी 2026 में हुए चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत हुई और तारिक रहमान ने 17 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

अब नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह पुराने राजनीतिक समीकरणों से आगे बढ़कर नई सरकार के साथ संबंधों को किस तरह मजबूत करे।

सबसे संवेदनशील मुद्दा फिलहाल शेख हसीना का भारत में रहना और उनके प्रत्यर्पण की बांग्लादेश की मांग है। अगस्त 2026 में यह मुद्दा दोनों देशों के बीच बातचीत के केंद्र में बना हुआ है। बांग्लादेश ने भारत से प्रत्यर्पण प्रक्रिया तेज करने का आग्रह किया है, जबकि भारत ने कहा है कि अनुरोध की समीक्षा कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जा रही है। 

हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि यह विवाद केवल अतीत का राजनीतिक प्रश्न नहीं है, बल्कि दोनों देशों के मौजूदा कूटनीतिक संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए अनुकूल माहौल की जरूरत पर जोर दिया है। 

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

ऐसे समय में भारत के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता टकराव नहीं, बल्कि संतुलित और दीर्घकालिक कूटनीति है।

सुरक्षा सहयोग को कमजोर नहीं होने देना होगा। व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से यथासंभव अलग रखना होगा। साथ ही, नई बांग्लादेशी सरकार के साथ संस्थागत संबंधों को मजबूत करना होगा, ताकि दोनों देशों के रिश्ते किसी एक नेता या सरकार पर निर्भर न रहें।

इसके अलावा चीन और अन्य बाहरी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को केवल राजनीतिक बयानबाजी से चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके लिए भारत को बेहतर आर्थिक विकल्प, मजबूत कनेक्टिविटी, निवेश और क्षेत्रीय सहयोग की पेशकश करनी होगी।

पूर्वोत्तर के लिए क्यों अहम है बांग्लादेश?

बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास से है।

यदि भारत-बांग्लादेश संबंध स्थिर रहते हैं तो त्रिपुरा, असम और पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए नए व्यापारिक रास्ते खुल सकते हैं। इसके विपरीत, यदि दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है तो सीमा सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता पर इसका असर पड़ सकता है।

इसलिए ढाका में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच नई दिल्ली की असली परीक्षा यही होगी कि वह व्यक्ति-केंद्रित रिश्तों से आगे बढ़कर भारत-बांग्लादेश संबंधों को संस्थागत, व्यावहारिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित साझेदारी में बदल सके।

यही रास्ता भारत के लिए भी सुरक्षित है और पूर्वोत्तर के लिए भी सबसे अधिक लाभकारी।

खबरें और भी हैं

Latest News

सन नियो के आगामी शो ‘राजनंदिनी’ में मुख्य भूमिका निभाएंगी नेहा सोलंकी, बोलीं- “दर्शकों को धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व के कई अलग-अलग पहलू देखने को मिलेंगे” सन नियो के आगामी शो ‘राजनंदिनी’ में मुख्य भूमिका निभाएंगी नेहा सोलंकी, बोलीं- “दर्शकों को धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व के कई अलग-अलग पहलू देखने को मिलेंगे”
मुंबई, अगस्त 2026: सन नियो के आगामी शो ‘राजनंदिनी’ में अभिनेत्री नेहा सोलंकी मुख्य भूमिका में नजर आएंगी। बदला, रहस्य...
स्कोडा ऑटो इंडिया ने नई स्लाविया के साथ सेडान विरासत का अगला अध्याय शुरू किया
राजस्थान में इंश्योरेंस को लेकर बढ़ी जागरूकता, टर्म प्लान बिजनेस में 96.7% की ग्रोथ
ढाका का बदलता मौसम, पूर्वोत्तर भारत की नई चुनौती
तुलसी से स्मृति तक: एक किरदार जिसने दी नई पहचान, और एक सफर जिसने गढ़ी अलग पहचान
Copyright (c) Parakh Khabar All Rights Reserved.