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                <title>संपादकीय - Parakh Khabar</title>
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                <title>परोपकार ही सबसे बड़ा प्रतिफल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>मनुष्य अक्सर यह सोचकर व्यथित हो जाता है कि उसने दूसरों के लिए इतना कुछ किया, लेकिन बदले में उसे क्या मिला। परंतु प्रकृति हमें सिखाती है कि सच्चा उपकार कभी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता। बादल बिना किसी स्वार्थ के धरती पर जल बरसाते हैं, नदियाँ खेतों को सींचकर हरियाली देती हैं, पृथ्वी जीवनभर हमारा भार सहती है और वृक्ष हमें फल, छाया व लकड़ी प्रदान करते हैं। फिर भी वे किसी प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखते।</p>
<p>युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार, "परोपकार स्वयं ही एक बदला है।" त्याग और सेवा पहली दृष्टि में घाटे का सौदा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/charity-is-the-greatest-reward/article-33178"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2026-06/gsp_vijendra-nath-chaube.jpg" alt=""></a><br /><p>मनुष्य अक्सर यह सोचकर व्यथित हो जाता है कि उसने दूसरों के लिए इतना कुछ किया, लेकिन बदले में उसे क्या मिला। परंतु प्रकृति हमें सिखाती है कि सच्चा उपकार कभी प्रतिफल की अपेक्षा नहीं करता। बादल बिना किसी स्वार्थ के धरती पर जल बरसाते हैं, नदियाँ खेतों को सींचकर हरियाली देती हैं, पृथ्वी जीवनभर हमारा भार सहती है और वृक्ष हमें फल, छाया व लकड़ी प्रदान करते हैं। फिर भी वे किसी प्रतिदान की अपेक्षा नहीं रखते।</p>
<p>युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार, "परोपकार स्वयं ही एक बदला है।" त्याग और सेवा पहली दृष्टि में घाटे का सौदा लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में यही मनुष्य को आंतरिक शांति, संतोष और महानता प्रदान करते हैं। उपकारी व्यक्ति जानता है कि उसके कार्यों से जितना लाभ दूसरों को होता है, उससे कहीं अधिक लाभ उसका स्वयं का होता है।</p>
<p>ज्ञानवान व्यक्ति अपनी उपलब्धियों और संसाधनों को समाज के साथ साझा करते हैं। वे समझते हैं कि जब प्रकृति जीवन जैसी अमूल्य देन निःशुल्क प्रदान करती है, तो हमें भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार दूसरों की सहायता करने में संकोच नहीं करना चाहिए।</p>
<p>विपरीत परिस्थितियों और कठिन समय में भी परोपकार का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। किसी की सहायता करना, त्याग करना या जरूरतमंद को सहयोग देना वास्तव में एक ऐसी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसका प्रतिफल भविष्य में कई गुना होकर लौटता है। जो कुछ हम दूसरों को देते हैं, वह हमारी संचित पुण्य-पूंजी के रूप में सुरक्षित हो जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 19:48:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
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                <title>NEET : नीट संकट ने खोल दी परीक्षा व्यवस्था की कमजोरियां, अब बड़े सुधारों की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[<p>देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी-2026 का रद्द होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के विश्वास को गहरा आघात पहुंचाने वाली घटना बनकर सामने आया है। यह उन छात्रों और परिवारों के लिए सबसे बड़ा झटका है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संघर्ष और उम्मीदों के साथ इस परीक्षा को अपने भविष्य का आधार माना था।</p>
<p>किसी छात्र ने गांव छोड़कर शहर में कमरा लिया, किसी परिवार ने जमीन बेचकर कोचिंग की फीस भरी, तो किसी ने दो वर्षों तक खुद को पूरी तरह पढ़ाई तक सीमित रखा। लेकिन कुछ लोगों के लालच और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/education/neet-crisis-has-exposed-the-weaknesses-of-the-examination-system/article-32871"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2026-05/cats233.jpg" alt=""></a><br /><p>देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट यूजी-2026 का रद्द होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के विश्वास को गहरा आघात पहुंचाने वाली घटना बनकर सामने आया है। यह उन छात्रों और परिवारों के लिए सबसे बड़ा झटका है, जिन्होंने वर्षों की मेहनत, आर्थिक संघर्ष और उम्मीदों के साथ इस परीक्षा को अपने भविष्य का आधार माना था।</p>
<p>किसी छात्र ने गांव छोड़कर शहर में कमरा लिया, किसी परिवार ने जमीन बेचकर कोचिंग की फीस भरी, तो किसी ने दो वर्षों तक खुद को पूरी तरह पढ़ाई तक सीमित रखा। लेकिन कुछ लोगों के लालच और परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों ने लाखों मेहनती विद्यार्थियों को अचानक असमंजस और निराशा के बीच खड़ा कर दिया।</p>
<p>इस पूरे घटनाक्रम ने देश के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है— क्या भारत की मौजूदा परीक्षा व्यवस्था अब भी पुराने ढांचे पर भरोसा करके चल सकती है, या फिर इसे पूरी तरह तकनीक आधारित और सुरक्षित मॉडल में बदलने का समय आ चुका है?</p>
<p>आज सबसे बड़ी चिंता केवल पेपर लीक की घटना नहीं है, बल्कि छात्रों के मन में पैदा हो रहा अविश्वास है। जब मेहनत करने वाला विद्यार्थी यह महसूस करने लगे कि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष और सुरक्षित नहीं है, तब यह केवल परीक्षा का संकट नहीं रहता, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो जाता है।</p>
<p>प्रारंभिक जांच में सामने आई जानकारियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि पेपर लीक अब किसी एक सेंटर या छोटे गिरोह तक सीमित नहीं रहा। देहरादून, सीकर, जयपुर, गुरुग्राम और अन्य शहरों से जुड़े नेटवर्क यह दर्शाते हैं कि यह अब संगठित माफिया तंत्र का रूप ले चुका है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ये नेटवर्क अब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप, क्लोज्ड डिजिटल ग्रुप्स और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे जांच एजेंसियों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल एफआईआर दर्ज कर लेना या कुछ गिरफ्तारियां कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता पूरी परीक्षा प्रणाली को नए सिरे से तैयार करने की है।</p>
<p>नीट वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी ऑफलाइन परीक्षाओं में शामिल है, जिसमें लगभग 22 लाख विद्यार्थी भाग लेते हैं। प्रश्नपत्र प्रिंटिंग प्रेस से लेकर परीक्षा केंद्र तक कई चरणों और अनेक लोगों के संपर्क से गुजरता है। यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी मानी जा रही है।</p>
<p>इसके विपरीत जेईई मेन जैसी परीक्षाएं कंप्यूटर आधारित टेस्ट (सीबीटी) मोड में आयोजित की जाती हैं, जहां प्रश्नपत्र परीक्षा शुरू होने के बाद ही स्क्रीन पर दिखाई देता है। अलग-अलग प्रश्न सेट और एल्गोरिदम आधारित प्रश्न वितरण के कारण पेपर लीक की संभावना बेहद कम हो जाती है। यही वजह है कि अब शिक्षा विशेषज्ञ नीट को भी चरणबद्ध तरीके से तकनीक आधारित मॉडल में बदलने की मांग कर रहे हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार भारत में यह बदलाव संभव है। कोविड काल के बाद देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑनलाइन सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। बैंकिंग, सरकारी सेवाएं, डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन शिक्षा अब गांवों तक पहुंच चुकी हैं। जेईई मेन, सीयूईटी और कई बैंकिंग परीक्षाएं पहले से सफलतापूर्वक ऑनलाइन आयोजित की जा रही हैं।</p>
<p>ऐसे में नीट को भी चरणबद्ध तरीके से कंप्यूटर आधारित मॉडल में बदला जा सकता है। शुरुआती चरण में बड़े शहरों और मजबूत डिजिटल सुविधाओं वाले क्षेत्रों में सीबीटी मोड लागू किया जा सकता है, जबकि सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में कुछ समय तक हाइब्रिड मॉडल अपनाया जा सकता है।</p>
<p>विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल ऑनलाइन परीक्षा पर्याप्त समाधान नहीं होगी। सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदलना होगा। प्रश्नपत्र निर्माण और वितरण को “जीरो ह्यूमन एक्सेस मॉडल” की ओर ले जाना होगा, जहां पेपर तैयार होने के बाद किसी व्यक्ति के पास उसकी पूरी कॉपी न हो। इसके लिए एआई आधारित एन्क्रिप्शन और डिजिटल लॉकिंग सिस्टम अपनाने की जरूरत होगी।</p>
<p>इसके साथ ही परीक्षा केंद्रों पर एआई आधारित कैमरा निगरानी, लाइव कंट्रोल रूम, रियल टाइम अलर्ट सिस्टम और मजबूत बायोमेट्रिक सत्यापन व्यवस्था लागू करनी होगी। केवल फिंगरप्रिंट ही नहीं, बल्कि फेस रिकग्निशन और मल्टी-लेयर पहचान प्रणाली से डमी उम्मीदवारों की समस्या पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है।</p>
<p>दुनिया के कई देशों में मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं पूरी तरह कंप्यूटर आधारित हैं। अमेरिका, यूरोप, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में एआई निगरानी, फेस रिकग्निशन और डिजिटल सुरक्षा तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। भारत भी इन मॉडलों से सीख लेकर अपनी परीक्षा प्रणाली को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बना सकता है।</p>
<p>नीट यूजी-2026 का रद्द होना केवल एक परीक्षा रद्द होना नहीं है, बल्कि यह देश की परीक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी बड़ी चुनौती का संकेत है। यदि अब भी व्यापक और संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो हर वर्ष लाखों विद्यार्थियों का भरोसा इसी तरह टूटता रहेगा। अब समय केवल आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनाने का है, जिस पर हर विद्यार्थी पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ भरोसा कर सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>एजुकेशन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 May 2026 06:56:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
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                <title>मेरी व्यथा… डॉ. अतुल मलिकराम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>दिनभर की गतिविधियों के बाद जब दफ्तर में सन्नाटा पसर जाता है, तब कई उद्यमियों के मन में आत्ममंथन के प्रश्न उभरते हैं। यह वही सपना है या नहीं, जिसकी शुरुआत कभी सीमित संसाधनों और बड़े संकल्प के साथ की गई थी—ऐसे सवाल अक्सर नेतृत्व की भूमिका में बैठे लोगों को मथते हैं।</p>
<p>उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकांश संस्थानों की शुरुआत एक विचार और साझा संघर्ष से होती है। प्रारंभिक दौर में पूँजी सीमित होती है, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट होता है। उस समय हर कर्मचारी और सहयोगी संस्थान को अपना मानकर कार्य करता है और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/my-agony-dr-atul-malikram/article-31849"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2026-03/img-20260303-wa0054.jpg" alt=""></a><br /><p>दिनभर की गतिविधियों के बाद जब दफ्तर में सन्नाटा पसर जाता है, तब कई उद्यमियों के मन में आत्ममंथन के प्रश्न उभरते हैं। यह वही सपना है या नहीं, जिसकी शुरुआत कभी सीमित संसाधनों और बड़े संकल्प के साथ की गई थी—ऐसे सवाल अक्सर नेतृत्व की भूमिका में बैठे लोगों को मथते हैं।</p>
<p>उद्योग जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि अधिकांश संस्थानों की शुरुआत एक विचार और साझा संघर्ष से होती है। प्रारंभिक दौर में पूँजी सीमित होती है, लेकिन लक्ष्य स्पष्ट होता है। उस समय हर कर्मचारी और सहयोगी संस्थान को अपना मानकर कार्य करता है और भविष्य को लेकर सामूहिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है।</p>
<p>समय के साथ जैसे-जैसे संस्थान का विस्तार होता है, संरचना मजबूत होती है और व्यवसाय स्थिरता प्राप्त करता है, वैसे-वैसे कार्य-संस्कृति में भी बदलाव आने लगता है। छोटे कार्यालयों की जगह बड़े परिसर ले लेते हैं, भूमिकाएँ स्पष्ट हो जाती हैं और जिम्मेदारियाँ औपचारिक प्रक्रियाओं में बदलने लगती हैं।</p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार, इसी चरण में कई संस्थानों में भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ने लगता है। कार्य समयबद्ध हो जाता है, लक्ष्य विभागों में बँट जाते हैं और संगठन, जो कभी साझा सपना था, धीरे-धीरे कुछ लोगों के लिए केवल रोजगार का माध्यम बनकर रह जाता है।</p>
<p>नेतृत्व से जुड़े लोग मानते हैं कि इस स्थिति में भी अंतिम जिम्मेदारी संस्थान प्रमुख पर ही आती है। वित्तीय दायित्व, निवेशकों का भरोसा, ग्राहकों की अपेक्षाएँ और कर्मचारियों की स्थिरता—इन सभी का भार निर्णय लेने वाले व्यक्ति पर होता है। हालांकि यह भूमिका स्वीकार्य होती है, लेकिन कई बार नेतृत्व की यह यात्रा अकेली लगने लगती है।</p>
<p>उद्योग जगत के जानकारों का कहना है कि किसी भी संगठन की मजबूती केवल पूँजी या संसाधनों से नहीं, बल्कि विश्वास, सहभागिता और स्वामित्व की भावना से तय होती है। जब कर्मचारी स्वयं को केवल वेतनभोगी नहीं, बल्कि निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा मानते हैं, तभी संगठन दीर्घकालिक सफलता की ओर बढ़ता है।</p>
<p>विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आज के कर्मचारी सक्षम और तकनीकी रूप से दक्ष हैं, लेकिन बड़े संगठनों में व्यक्तिगत योगदान का प्रभाव स्पष्ट न दिख पाने के कारण भावनात्मक जुड़ाव कमजोर हो सकता है। ऐसे में नेतृत्व की भूमिका केवल प्रबंधन तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि संवाद और प्रेरणा भी उतनी ही आवश्यक हो जाती है।</p>
<p>उनका कहना है कि संस्थानों को समय-समय पर यह याद दिलाने की आवश्यकता होती है कि संगठन एक जीवित इकाई है, जिसे निरंतर प्रतिबद्धता और विश्वास की ऊर्जा चाहिए। केवल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि साझा उद्देश्य से संगठन आगे बढ़ता है।</p>
<p>अंततः, उद्योग जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी चुनौती सपने को साझा बनाए रखना है। जब नेतृत्व अपनी टीम को सहभागी मानता है और कर्मचारी संगठन को अपना समझते हैं, तब कंपनी केवल बाजार में ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पहचान भी स्थापित करती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Mar 2026 18:41:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमेरिका में भयावह हमले: दो घटनाओं ने खड़े किए सुरक्षा पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p>अमेरिका में दो दिनों के भीतर हुई दो घटनाओं ने देश को झकझोर कर रख दिया है। न्यू ऑर्लियंस में नए साल के जश्न के दौरान भीड़ पर ट्रक चढ़ा दिया गया, जिसमें अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। घटना के दौरान ट्रक पर इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का झंडा लगा हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसे आतंकवादी हमला करार दिया है।</p>
<p>दूसरी घटना लास वेगास में ट्रंप टावर के पास हुई, जहां एक टेस्ला साइबर ट्रक में अचानक विस्फोट हो गया। ट्रक में भारी मात्रा में विस्फोटक भरे हुए थे। इस घटना के बाद इलाके</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/horrific-attacks-in-america-two-incidents-raise-questions-on-security/article-22942"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2025-01/demo-image-v---2025-01-01t194837.4711.jpg" alt=""></a><br /><p>अमेरिका में दो दिनों के भीतर हुई दो घटनाओं ने देश को झकझोर कर रख दिया है। न्यू ऑर्लियंस में नए साल के जश्न के दौरान भीड़ पर ट्रक चढ़ा दिया गया, जिसमें अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। घटना के दौरान ट्रक पर इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) का झंडा लगा हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसे आतंकवादी हमला करार दिया है।</p>
<p>दूसरी घटना लास वेगास में ट्रंप टावर के पास हुई, जहां एक टेस्ला साइबर ट्रक में अचानक विस्फोट हो गया। ट्रक में भारी मात्रा में विस्फोटक भरे हुए थे। इस घटना के बाद इलाके में कई अन्य बम भी बरामद हुए, जिससे संकेत मिलता है कि यह हमला पूरी तरह योजनाबद्ध था।</p>
<h3>दोनों घटनाओं के संभावित कनेक्शन की जांच जारी</h3>
<p>राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा कि दोनों घटनाओं के बीच किसी संभावित संबंध की जांच की जा रही है। खास बात यह है कि दोनों वाहन एक ही रेंटल एप से किराए पर लिए गए थे। ये घटनाएं ऐसे समय में हुई हैं, जब डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में लौटने में कुछ ही दिन बाकी हैं। इन हमलों ने अमेरिका में सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवादी समूहों की बढ़ती गतिविधियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p>
<h3>वैश्विक निंदा और बढ़ती चिंता</h3>
<p>न्यू ऑर्लियंस के हमले की वैश्विक स्तर पर निंदा की जा रही है। इस हमले ने अमेरिका में सुरक्षा खामियों की पोल खोल दी है और यह आशंका बढ़ा दी है कि कहीं देश 9/11 जैसे माहौल की ओर न लौट जाए।</p>
<h3>आईएसआईएस की नई रणनीति</h3>
<p>विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला आईएसआईएस की नई रणनीति का हिस्सा हो सकता है। हाल के वर्षों में आईएसआईएस ने यूरोप में भी इसी तरह के हमले किए हैं, जहां जर्मनी सहित कई यूरोपीय देशों को निशाना बनाया गया। 2019 में अमेरिका और सहयोगियों द्वारा आईएसआईएस की खिलाफत को खत्म करने के बाद संगठन का प्रभाव कमजोर हुआ था, लेकिन अब उसके समर्थक अमेरिका में हमलों को अंजाम दे रहे हैं।</p>
<h3>सुरक्षा व्यवस्था पर नए सिरे से जोर देने की जरूरत</h3>
<p>आईएसआईएस को अल कायदा से भी अधिक हिंसक और चरमपंथी माना जाता है। इस तरह की घटनाएं सामान्य हमले नहीं हैं। अमेरिका को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना होगा, क्योंकि यदि आईएसआईएस की जड़ें अमेरिका में मजबूत हुईं, तो यह देश के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।</p>
<h3>भविष्य की राह</h3>
<p>इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका को आतंकवाद के खिलाफ सतर्क रहना होगा। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह के हमलों से निर्दोष नागरिकों को नुकसान न पहुंचे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jan 2025 08:59:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
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                <title>भारतीय श्रमिकों की दुर्दशा: एक गंभीर मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया कुवैत यात्रा ने वहां काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया है। कुवैत में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार मौजूद हैं, जो मुख्यतः स्वास्थ्य और तेल क्षेत्र में कार्यरत हैं। ये कामगार न केवल कुवैत की प्रगति और अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रहे हैं। कुवैत में काम करने वाले भारतीय हर साल अपने परिवारों के लिए बड़ी रकम भारत भेजते हैं, जिससे उनके घरों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होता है।</p>
<p>मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुवैत से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/the-plight-of-indian-workers-is-a-serious-issue/article-22318"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/image_search_1735010689934.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया कुवैत यात्रा ने वहां काम कर रहे भारतीय श्रमिकों की स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया है। कुवैत में बड़ी संख्या में भारतीय कामगार मौजूद हैं, जो मुख्यतः स्वास्थ्य और तेल क्षेत्र में कार्यरत हैं। ये कामगार न केवल कुवैत की प्रगति और अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे हैं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रहे हैं। कुवैत में काम करने वाले भारतीय हर साल अपने परिवारों के लिए बड़ी रकम भारत भेजते हैं, जिससे उनके घरों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था को भी फायदा होता है।</p>
<p>मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुवैत से भारत भेजे जाने वाली धनराशि 6.3 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। 2023-2024 में भारत और कुवैत के बीच व्यापार का आंकड़ा 10.47 अरब डॉलर रहा। यह पिछले चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली कुवैत यात्रा थी। पीएम मोदी ने कुवैत की तरक्की में भारत के योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने यह संदेश दिया कि "न्यू कुवैत" बनाने के लिए भारत के पास तकनीक और मैनपावर की पूरी क्षमता है। खाड़ी देशों में बसे लाखों भारतीय वहां भारत के लिए एक भरोसेमंद छवि बना रहे हैं और कुवैत की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।</p>
<p>हालांकि, कुवैत में भारतीय श्रमिकों को आए दिन कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो चिंता का विषय है। भारतीय सरकार ने प्रवासी श्रमिकों के लिए उत्प्रवासन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ई-माइग्रेट प्रणाली का आरंभ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास था। लेकिन श्रमिकों की समस्याओं के समाधान के लिए और भी ठोस उपायों की आवश्यकता है।</p>
<p>भारत को अपने उत्प्रवासन अधिनियम में सुधार करना चाहिए, साथ ही भर्ती एजेंटों की सख्त निगरानी और विदेशी नियोक्ताओं से उच्च मुआवजे की गारंटी सुनिश्चित करनी चाहिए। प्रवासी भारतीयों के संघर्षों को दूर करने के लिए प्रवासी भारतीय सम्मेलन जैसे मंचों का अधिक प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए।</p>
<p>भारतीय कामगारों की दुर्दशा, वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विपरीत है। यह आवश्यक है कि भारत अपने प्रवासी श्रमिकों की समस्याओं का समाधान करे, ताकि वे सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से काम कर सकें और भारत का गौरव बढ़ा सकें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Dec 2024 08:56:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छात्रों के हित में एनसीईआरटी का सराहनीय कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>यह कहना उचित होगा कि राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा 9 से 12 तक की पाठ्य पुस्तकों की कीमतों में 20 प्रतिशत की कटौती छात्रों के लिए एक बड़ा लाभ साबित होगी। यह पहला मौका है जब पाठ्य पुस्तकों की कीमतों में कमी की गई है।</p>
<h3>कीमतों में कटौती के कारण</h3>
<p>एनसीईआरटी के अनुसार, इस बार कागज की खरीद किफायती दरों पर हुई है और प्रिंटिंग तकनीक में सुधार के कारण लागत कम आई है। इसका सीधा लाभ छात्रों को देने का निर्णय लिया गया है। हाल ही में एनसीईआरटी ने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/commendable-step-taken-by-ncert-in-the-interest-of-students/article-22241"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/image_search_1734925064421.jpg" alt=""></a><br /><p>यह कहना उचित होगा कि राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा अगले शैक्षणिक वर्ष के लिए कक्षा 9 से 12 तक की पाठ्य पुस्तकों की कीमतों में 20 प्रतिशत की कटौती छात्रों के लिए एक बड़ा लाभ साबित होगी। यह पहला मौका है जब पाठ्य पुस्तकों की कीमतों में कमी की गई है।</p>
<h3>कीमतों में कटौती के कारण</h3>
<p>एनसीईआरटी के अनुसार, इस बार कागज की खरीद किफायती दरों पर हुई है और प्रिंटिंग तकनीक में सुधार के कारण लागत कम आई है। इसका सीधा लाभ छात्रों को देने का निर्णय लिया गया है। हाल ही में एनसीईआरटी ने अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी की है, जिससे छात्रों को समय पर और प्रिंट रेट पर पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध हो रही हैं।</p>
<h3>पुस्तकों की बढ़ती मांग और नई योजनाएं</h3>
<p>एनसीईआरटी हर साल लगभग 4-5 करोड़ पुस्तकें छापता रहा है। बढ़ती मांग को देखते हुए इसने अब सालाना 15 करोड़ पुस्तकें छापने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत नई पाठ्य पुस्तकों को तैयार करने का काम भी किया जा रहा है। आगामी शैक्षणिक सत्र में चौथी, पांचवीं, सातवीं और आठवीं कक्षाओं के लिए नई पुस्तकें उपलब्ध होंगी, जबकि कक्षा 9 से 12 की नई पुस्तकें अगले सत्र में आएंगी।</p>
<h3>एनसीईआरटी पुस्तकों की लोकप्रियता</h3>
<p>सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में कक्षा 9 से 12 के छात्रों के लिए एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य हैं। पाठ्यक्रम केंद्रित, समय पर उपलब्धता और अन्य प्रकाशनों की तुलना में सस्ती होने के कारण ये किताबें छात्रों के बीच पहले से ही लोकप्रिय हैं। इनके उच्च स्तर की सामग्री के कारण सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए भी इनकी मांग अधिक रहती है।</p>
<h3>शिक्षा क्षेत्र में बढ़ा खर्च और सुधार</h3>
<p>केंद्रीय शिक्षा मंत्री के अनुसार, पिछले दस वर्षों में प्रति छात्र पर होने वाले खर्च में 130 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2013-14 में यह खर्च 10,780 रुपये था, जो 2021-22 में बढ़कर 25,043 रुपये हो गया। इस दौरान नामांकन, पास होने वाले छात्रों की संख्या, नए स्कूल और उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। बड़ी संख्या में स्कूल अब बिजली और इंटरनेट जैसी सुविधाओं से लैस हैं।</p>
<h3>छात्रों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण कदम</h3>
<p>एनसीईआरटी द्वारा की गई यह पहल और शिक्षा क्षेत्र में हो रहे अन्य सुधार न केवल छात्रों की शिक्षा को किफायती बनाएंगे, बल्कि उनके भविष्य को एक नई दिशा भी प्रदान करेंगे। यह कदम छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए राहत लेकर आया है और शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Dec 2024 09:09:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आतंक मुक्त जम्मू-कश्मीर: जीरो टॉलरेंस नीति से बड़ी कामयाबी</title>
                                    <description><![CDATA[<p>केंद्र सरकार की सख्त आतंकवाद विरोधी नीति के चलते जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठनों, विशेष रूप से हिजबुल मुजाहिदीन, का लगभग सफाया हो गया है। आतंक मुक्त जम्मू-कश्मीर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों और केंद्र सरकार की दृढ़ नीतियों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक रणनीति ने नागरिकों और सैनिकों के बीच आपसी विश्वास को मजबूत किया है, जो आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</p>
<h4>महत्वपूर्ण उपलब्धियां</h4>
<p>पिछले पांच वर्षों में सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर में 720 आतंकवादियों को मार गिराया। 2024 की शुरुआत से अब तक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/terror-free-jammu-and-kashmir-a-big-success-with-zero/article-22116"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/demo-image-v---2024-12-21t084311.287.jpg" alt=""></a><br /><p>केंद्र सरकार की सख्त आतंकवाद विरोधी नीति के चलते जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठनों, विशेष रूप से हिजबुल मुजाहिदीन, का लगभग सफाया हो गया है। आतंक मुक्त जम्मू-कश्मीर के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षा बलों के समन्वित प्रयासों और केंद्र सरकार की दृढ़ नीतियों ने उल्लेखनीय प्रगति की है। राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक रणनीति ने नागरिकों और सैनिकों के बीच आपसी विश्वास को मजबूत किया है, जो आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।</p>
<h4>महत्वपूर्ण उपलब्धियां</h4>
<p>पिछले पांच वर्षों में सुरक्षा बलों ने जम्मू-कश्मीर में 720 आतंकवादियों को मार गिराया। 2024 की शुरुआत से अब तक 64 आतंकवादी मारे गए हैं, जिनमें 42 विदेशी आतंकवादी शामिल हैं। हर 5वें दिन सुरक्षाबल एक आतंकी को ढेर कर रहे हैं आतंकवादी हिंसा और घुसपैठ की घटनाओं में कमी आई है।</p>
<h4>सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी</h4>
<p>गुरुवार को कुलगाम जिले के कद्देर गांव में सुरक्षाबलों ने पांच हिजबुल मुजाहिदीन आतंकियों को मार गिराया। इसके साथ ही यह स्थानीय आतंकी समूह लगभग समाप्त हो गया है। यह घटना आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों की दृढ़ता और उनकी रणनीति की सफलता को दर्शाती है।</p>
<h4>आतंकवाद के इकोसिस्टम पर चोट</h4>
<p>मोदी सरकार की नई आतंकवाद रोधी नीति न केवल आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है, बल्कि उनके पूरे इकोसिस्टम को खत्म करने पर भी ध्यान केंद्रित करती है। विशेष यूनिटों के जरिए युवाओं को कट्टरपंथ की ओर जाने से रोका जा रहा है। युवाओं की आतंकवादी संगठनों में भर्ती में गिरावट आई है। आतंकवाद विरोधी इकाइयों और सुरक्षा बलों ने मिलकर आतंकवाद का समर्थन करने वाले ढांचे को कमजोर किया है।</p>
<h4>लोकतंत्र और विकास में बढ़ती भागीदारी</h4>
<p>जम्मू-कश्मीर में चुनावों में अभूतपूर्व भागीदारी यह दर्शाती है कि लोग भारत के लोकतंत्र और सुरक्षा बलों पर भरोसा कर रहे हैं। सरकार ने आतंकवाद मुक्त माहौल बनाने के लिए हर संभव संसाधन उपलब्ध कराए हैं।</p>
<h4>भविष्य की रणनीति</h4>
<p>हालांकि आतंकवाद पर नियंत्रण के बावजूद अभी भी कुछ चुनौतियां बाकी हैं। सुरक्षा उपकरणों के आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण पर ध्यान देना आवश्यक है। सीमापार से घुसपैठ रोकने के लिए बहुआयामी रणनीति विकसित करनी होगी। सुरक्षा बलों और सरकार के निरंतर प्रयासों से उम्मीद है कि जल्द ही जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह आतंकवाद मुक्त बनाया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Dec 2024 08:58:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारत की आर्थिक क्षमता का आंशिक उपयोग अब तक हुआ है, लेकिन यह कम श्रम भागीदारी और सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इसके बावजूद, वैश्वीकरण के प्रभाव ने भारत को निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर किया है। वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को बड़े पैमाने पर परिवर्तित किया है और इसके आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहरा प्रभाव डाला है।</p>
<h2>भारत की वैश्विक स्थिति</h2>
<p>भारत, बाजार पूंजीकरण के आधार पर, विश्व का चौथा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। वैश्वीकरण ने देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। व्यापार और निवेश के नए अवसरों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/need-for-a-balanced-approach/article-22073"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/20241220_091311.png" alt=""></a><br /><p>भारत की आर्थिक क्षमता का आंशिक उपयोग अब तक हुआ है, लेकिन यह कम श्रम भागीदारी और सामाजिक-राजनीतिक जटिलताओं जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इसके बावजूद, वैश्वीकरण के प्रभाव ने भारत को निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर किया है। वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को बड़े पैमाने पर परिवर्तित किया है और इसके आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहरा प्रभाव डाला है।</p>
<h2>भारत की वैश्विक स्थिति</h2>
<p>भारत, बाजार पूंजीकरण के आधार पर, विश्व का चौथा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। वैश्वीकरण ने देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। व्यापार और निवेश के नए अवसरों ने न केवल आर्थिक विकास को गति दी है, बल्कि उद्योगों का विस्तार और रोजगार के अवसर भी बढ़ाए हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उन्नति ने भारत की वैश्विक पहचान को सुदृढ़ किया है।</p>
<h2>स्टार्टअप और स्मार्ट सिटी पहल</h2>
<p>भारत अब विश्व स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप हब बन चुका है। साथ ही, 100 स्मार्ट शहरों के विकास की योजना से देश की शहरी संरचना को मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है। वैश्वीकरण के कारण अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजार में निवेश कर रही हैं, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को लाभ हो रहा है।</p>
<h2>चुनौतियां और असमानताएं</h2>
<p>वैश्वीकरण ने धन के असमान वितरण को भी बढ़ावा दिया है। इसका लाभ शहरी अभिजात वर्ग को हुआ है, जबकि ग्रामीण और सीमांत वर्ग अभी भी पीछे रह गए हैं।</p>
<h2>आर्थिक विकास का संतुलन</h2>
<p>1947 में स्वतंत्रता के समय भारत की वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी मात्र 2% थी, जो 2023 तक 7.93% तक पहुंच गई। हालांकि, भारत के आर्थिक भविष्य का आधार अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन पर टिका है।</p>
<p>घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा: आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।</p>
<p>समुत्थानशील आपूर्ति शृंखलाएं: स्थिर और सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं की स्थापना की जानी चाहिए।</p>
<p>अनुसंधान एवं विकास: नवाचार और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए निवेश बढ़ाना चाहिए।</p>
<p>समावेशी विकास: आर्थिक लाभ सभी वर्गों तक पहुंचे, इसके लिए नीतिगत सुधार आवश्यक हैं।</p>
<p>पर्यावरण संरक्षण: विकास की गति को टिकाऊ बनाए रखने के लिए पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देनी होगी।</p>
<p>भारत के लिए वैश्वीकृत दुनिया में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है, जो रणनीतिक स्वायत्तता और घरेलू विकास पर समान रूप से केंद्रित हो। इससे भारत समावेशी और सतत विकास के मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.parakhkhabar.com/editorial/need-for-a-balanced-approach/article-22073</link>
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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2024 09:15:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Parakh Khabar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चीन का भरोसा</title>
                                    <description><![CDATA[<p>चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बुधवार को  वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने तथा पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के कारण चार वर्ष से अधिक समय से तल्ख रहे द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने के लिए मुलाकात की। यह वार्ता भारत-चीन संबंधों को मजूबत करने की दिशा में एक अहम कदम है।</p>
<p>महत्वपूर्ण है भारत और चीन पांच साल के बाद सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता को फिर से शुरू करने के लिए तैयार हुए हैं। वार्ता नई दिल्ली में हुई रचनात्मक चर्चाओं और पूर्वी लद्दाख में वास्तविक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/chinas-confidence/article-22072"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/cats346.jpg" alt=""></a><br /><p>चीन के विदेश मंत्री वांग यी और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बुधवार को  वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाए रखने तथा पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के कारण चार वर्ष से अधिक समय से तल्ख रहे द्विपक्षीय संबंधों को बहाल करने के लिए मुलाकात की। यह वार्ता भारत-चीन संबंधों को मजूबत करने की दिशा में एक अहम कदम है।</p>
<p>महत्वपूर्ण है भारत और चीन पांच साल के बाद सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधि वार्ता को फिर से शुरू करने के लिए तैयार हुए हैं। वार्ता नई दिल्ली में हुई रचनात्मक चर्चाओं और पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर टकराव के दो बिंदुओं से हाल ही में सैनिकों की वापसी के बाद हो रही है। ताजा घटनाक्रम द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक पहल को दर्शाता है।  </p>
<p>भारत और चीन अपने संबंधों में सुधार कर रहे हैं, जो लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। पूर्वी लद्दाख में एलएसी  पर सैन्य गतिरोध मई 2020 में शुरू हुआ और उसी साल जून में गलवान घाटी में घातक झड़प हुई, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पड़ोसियों के बीच संबंधों में गंभीर तनाव पैदा हो गया था। व्यापार को छोड़कर, दोनों देशों के बीच संबंध लगभग ठप हो गए। यह गतिरोध एक समझौते के तहत देपसांग और डेमचोक से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद समाप्त हुआ था।</p>
<p>सैनिकों की वापसी के समझौते को 21 अक्टूबर को अंतिम रूप दिया गया था। भारत-चीन के बीच 3488 किलोमीटर लंबी सीमा से जुड़े विवाद को निपटाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में 22 बार बैठकें हुई हैं। परंतु दोनों देशों के बीच मौजूदा संधियों का पालन करने से चीन हमेशा मुकरता रहा और विवाद को सुलझाने में सफलता नहीं मिली।</p>
<p>उम्मीद की जा सकती है कि विशेष प्रतिनिधि वार्ता तनाव कम करने और सैनिकों की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, जो लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में एलएसी पर तैनात हैं।  चीन भी इससे दबाब महसूस करता है। विशेषज्ञों के मुताबिक चीन को पूरी तरह से पीछे हटना चाहिए और अपनी सेना को अप्रैल 2020 से पहले की तैनाती में वापस ले जाना चाहिए।  </p>
<p>1993 और 1996 के समझौतों का सम्मान करना चाहिए। राहत की बात है कि चीन  ने वार्ता के बाद भरोसा दिलाया है कि वह मतभेदों को सुलझाने के लिए तैयार है। द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ एवं सतत तरीके से आगे बढ़ाने के मकसद से भारत के साथ मिलकर काम करने को तैयार है।  दोनों देशों के बीच तनाव कम करने के लिए चल रहे प्रयास सराहनीय हैं और प्रगति की दिशा में यह आधारभूत कदम है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Dec 2024 09:07:27 +0530</pubDate>
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                <title>चुनावी परिदृश्य में बदलाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p>एक राष्ट्र-एक चुनाव (ओएनओई) नई धारणा नहीं है। आजाद भारत के पहले चार आम चुनाव ऐसे ही हुए थे। एक राष्ट्र, एक चुनाव प्रक्रिया में बदलाव 1960 से तब शुरू हुआ जब गैर कांग्रेस पार्टियों ने राज्य स्तर पर सरकारें बनाना शुरू किया। इसमें यूपी, बंगाल, पंजाब, हरियाणा शामिल थे। 1969 में कांग्रेस का बंटवारा और 1971 युद्ध के बाद मध्यावधि चुनाव हुए और इसके बाद विधानसभा चुनावों की तारीखें कभी आम चुनाव से नहीं मिलीं और अलग-अलग चुनाव शुरू हो गया। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से एक देश एक चुनाव के समर्थक रहे हैं। प्रधानमंत्री</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/change-in-electoral-scenario/article-21953"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/demo-image-v---2024-12-15t121405.4591.jpg" alt=""></a><br /><p>एक राष्ट्र-एक चुनाव (ओएनओई) नई धारणा नहीं है। आजाद भारत के पहले चार आम चुनाव ऐसे ही हुए थे। एक राष्ट्र, एक चुनाव प्रक्रिया में बदलाव 1960 से तब शुरू हुआ जब गैर कांग्रेस पार्टियों ने राज्य स्तर पर सरकारें बनाना शुरू किया। इसमें यूपी, बंगाल, पंजाब, हरियाणा शामिल थे। 1969 में कांग्रेस का बंटवारा और 1971 युद्ध के बाद मध्यावधि चुनाव हुए और इसके बाद विधानसभा चुनावों की तारीखें कभी आम चुनाव से नहीं मिलीं और अलग-अलग चुनाव शुरू हो गया। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से एक देश एक चुनाव के समर्थक रहे हैं। प्रधानमंत्री ने 2019 के स्वतंत्रता दिवस पर एक देश एक चुनाव का मुद्दा उठाया था। मंगलवार को एक देश, एक चुनाव विधेयक को लोकसभा में पेश कर किया गया।</p>
<p>चर्चा के दौरान बड़े विपक्षी दलों ने विधेयक का विरोध किया। इसके बाद इसे संसद की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव पारित किया गया। ओएनओई के कार्यान्वयन के लिए सावधानीपूर्वक योजना, विधायी संशोधन और राष्ट्रीय हितों के साथ संघीय स्वायत्तता को संतुलित करने की क्षमता की आवश्यकता होगी।</p>
<p>वैश्विक मिसालों से सीखकर और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाकर, भारत इन चुनौतियों का समाधान कर सकता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सुधारों से अधिक सामंजस्यपूर्ण और कार्यात्मक चुनावी प्रणाली बनेगी। इस प्रक्रिया के समर्थकों का तर्क है कि इस तरह की प्रणाली प्रशासनिक दक्षता को बढ़ा सकती है, चुनाव संबंधी खर्चों को कम कर सकती है और नीति संबंधी निरंतरता को बढ़ावा दे सकती है। </p>
<p>भारत में शासन को सुव्यवस्थित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को उसके अनुकूल बनाने की आकांक्षाओं को देखते हुए “एक देश, एक चुनाव” की अवधारणा एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में उभरी है। वास्तव में यह पूरे भारत में चुनावी प्रक्रियाओं को समन्वित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, जिसका लक्ष्य अधिक दक्षता, कम लागत और सुव्यवस्थित शासन लाना है।</p>
<p>जैसा कि विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि इस फैसले से लोकतंत्र में मजबूती आएगी एवं सरकार की योजनाओं और नीतियों में निरंतरता बनी रहेगी। गौरतलब है पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति को प्राप्त हुईं  80 प्रतिशत प्रतिक्रियाएं एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में थीं। समिति के समक्ष 47 राजनीतिक दलों ने विचार प्रस्तुत किए। इनमें से 32 दलों ने संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग और सामाजिक सद्भाव जैसे लाभों का हवाला देते हुए एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया। इससे उम्मीद बनी कि व्यापक सार्वजनिक और राजनीतिक समर्थन के साथ, एक साथ चुनाव की अवधारणा भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और शासन की दक्षता को बढ़ाने के लिए तैयार है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Dec 2024 09:33:16 +0530</pubDate>
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                <title>विनिर्माण क्षेत्र के मुद्दे</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारत एक उभरता हुआ विनिर्माण केंद्र है। विनिर्माण क्षेत्र में विलय और अधिग्रहण गतिविधि में वृद्धि, सहायक सरकारी नीतियां, विस्तारित उत्पादन क्षमता और निजी इक्विटी और उद्यम पूंजी से पर्याप्त निवेश, देश की दीर्घकालिक आर्थिक सफलता के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में सीमेंस, जीई, फिलिप्स, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स, पेप्सिको, एबीबी, माइक्रोन आदि जैसी अग्रणी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादन सुविधाओं में बड़े नए निवेश किए गए हैं।</p>
<p>पिछले पांच वर्षों में, भारत ने विदेशी तकनीकी सहयोग में वृद्धि देखी है, विशेष रूप से मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में, जिसमें अमेरिका, जर्मनी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/manufacturing-sector-issues/article-21824"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/cats300.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत एक उभरता हुआ विनिर्माण केंद्र है। विनिर्माण क्षेत्र में विलय और अधिग्रहण गतिविधि में वृद्धि, सहायक सरकारी नीतियां, विस्तारित उत्पादन क्षमता और निजी इक्विटी और उद्यम पूंजी से पर्याप्त निवेश, देश की दीर्घकालिक आर्थिक सफलता के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर रहे हैं। विनिर्माण क्षेत्र में सीमेंस, जीई, फिलिप्स, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स, पेप्सिको, एबीबी, माइक्रोन आदि जैसी अग्रणी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा उत्पादन सुविधाओं में बड़े नए निवेश किए गए हैं।</p>
<p>पिछले पांच वर्षों में, भारत ने विदेशी तकनीकी सहयोग में वृद्धि देखी है, विशेष रूप से मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में, जिसमें अमेरिका, जर्मनी और जापान प्रमुख प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भागीदार हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान, भारत ने तेजी से फार्मास्यूटिकल्स और टीकों का उत्पादन करके अपनी विनिर्माण क्षमता का प्रदर्शन किया, जिससे इसकी विनिर्माण क्षमताओं के बारे में धारणाएं बदल गईं।</p>
<p>विडंबना है कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र वैश्विक मानकों से फिर भी पीछे है। क्योंकि भारत में रसद बुनियादी ढांचा खराब है, जिससे लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। बिजली की कमी और परिवहन नेटवर्क अपर्याप्त होने से आपूर्ति श्रृंखलाओं और उत्पादन दक्षता में दिक्कत होती है। भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को वियतनाम जैसे कम श्रम लागत वाले विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<p>भारत में अनुसंधान और विकास पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 प्रतिशत है, जो दक्षिण कोरिया (4.8 प्रतिशत) या चीन (2.4 प्रतिशत) से बहुत कम है। वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश कम श्रम और परिचालन लागत के साथ बेहतर कारोबारी माहौल देते हैं। भारत के विनिर्माण क्षेत्र में आर्थिक विकास, रोज़गार सृजन और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देने की अपार संभावनाएं हैं। अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2025 में भारत का पूंजीगत व्यय उच्च बना रहेगा। इसके लिए भारत को विनिर्माण क्षेत्र में कई मुद्दों का समाधान करना होगा।</p>
<p>महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण में तेजी लाने, प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और व्यापार करना आसान बनाने के लिए उद्योग हितधारकों के साथ काम कर रही है। गति शक्ति पहल के तहत मल्टी-मॉडल परिवहन प्रणालियों, बंदरगाह संपर्क और समर्पित माल गलियारों में निवेश में तेजी लाई जानी चाहिए। श्रम कानूनों, भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय अनुमोदन को सरल बनाने से अनुपालन लागत कम हो सकती है तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है। विनिर्माण परियोजनाओं के लिए एकीकृत एकल-खिड़की अनुमोदन प्रणाली लागू की जानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 09:00:52 +0530</pubDate>
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                <title>भारत-रूस संबंध</title>
                                    <description><![CDATA[<p>यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हाल ही में संपन्न हुई रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तीन दिवसीय रूस यात्रा दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूती देने की दिशा में बहुत उपयोगी रही। वह वहां सैन्य और सैन्य सहयोग पर भारत-रूस अंतर सरकारी आयोग के 21 वें सत्र में भाग लेने गए थे। वह आइएनएस तुशिल की फ्लैग रेजिंग सेरेमनी में भी शामिल हुए, जिसे काफी पहले भारतीय नौसेना में शामिल होना था, लेकिन कोविड, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में रुकावट तथा रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से यह टलता रहा था।</p>
<p>रक्षा मंत्री ने रूस के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.parakhkhabar.com/editorial/india-russia-relations/article-21598"><img src="https://www.parakhkhabar.com/media/400/2024-12/demo-image-v---2024-12-14t084046.319.jpg" alt=""></a><br /><p>यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हाल ही में संपन्न हुई रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की तीन दिवसीय रूस यात्रा दोनों देशों के रक्षा संबंधों को और मजबूती देने की दिशा में बहुत उपयोगी रही। वह वहां सैन्य और सैन्य सहयोग पर भारत-रूस अंतर सरकारी आयोग के 21 वें सत्र में भाग लेने गए थे। वह आइएनएस तुशिल की फ्लैग रेजिंग सेरेमनी में भी शामिल हुए, जिसे काफी पहले भारतीय नौसेना में शामिल होना था, लेकिन कोविड, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में रुकावट तथा रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से यह टलता रहा था।</p>
<p>रक्षा मंत्री ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के विभिन्न मुद्दों पर बात की। पुतिन से उनका यह कहना बहुत महत्वपूर्ण है कि भारत और रूस के बीच मित्रता विश्व के सबसे ऊंचे पर्वत से भी ऊंची और सबसे गहरे महासागर से भी गहरी है। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति को यह भी बताया कि भारत पर सार्वजनिक और निजी तौर पर कई तरह के दबाव हैं, इसके बावजूद वह हमेशा अपने रूसी मित्र के साथ खड़ा रहा और भविष्य में भी खड़ा रहेगा। </p>
<p>गौरतलब है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच उनका यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों ने इस पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच साझेदारी में अत्यधिक संभावनाएं हैं और भविष्य में साझा प्रयासों से शानदार नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। उनका यह भी कहना था कि दोनों देशों के बीच जी-20, ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ रहा है।</p>
<p>राजनाथ सिंह ने रूसी रक्षा मंत्री आंद्रे बेलासोव से रक्षा मुद्दों पर व्यापक बातचीत की और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ‘एस-400 ट्रंफ’ की शेष दो यूनिटों की आपूर्ति जल्दी करने का दबाव भी डाला। यूक्रेन से युद्ध के चलते भारत को दी जाने वाली इन दो यूनिटों की आपूर्ति में विलंब हुआ है। रक्षा मंत्री ने विभिन्न मिलिट्री हार्डवेयर के निर्माण के क्षेत्र में भारत में असीम संभावनाओं की जानकारी दी। रूसी रक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में अपने एक बयान में कहा है कि रूस और भारत के बीच आपसी सम्मान पर आधारित मजबूत और पुरानी दोस्ती है। उल्लेखनीय है कि जुलाई में मास्को में राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी की बैठक और अक्टूबर में कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हुई मुलाकातों के परिणामस्वरूप विशेष रणनीतिक साझेदारी और गहरी हुई है, जिसमें रक्षा क्षेत्र भी शामिल है। राजनाथ सिंह की इस यात्रा का उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आपसी संबंध को और मजबूत बनाना था, जिसमें वह काफी हद तक सफल रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 14 Dec 2024 09:36:30 +0530</pubDate>
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